मुंबई | भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश की सबसे लोकप्रिय डिजिटल भुगतान प्रणाली UPI को भविष्य की जरूरतों के मुताबिक और अधिक टिकाऊ और सुरक्षित बनाने का निर्णय लिया है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति घोषणा के बाद स्पष्ट किया कि बढ़ते लेनदेन के दबाव को संभालने के लिए UPI के तकनीकी ढांचे (Infrastructure) में महत्वपूर्ण बदलाव किए जाएंगे। इस पहल का मुख्य उद्देश्य सिस्टम की विफलता को रोकना, भुगतान की गति बढ़ाना और साइबर सुरक्षा को और अधिक चाक-चौबंद करना है, ताकि डिजिटल अर्थव्यवस्था की यह रीढ़ भविष्य में भी बिना किसी रुकावट के कार्य कर सके।
यूपीआई के व्यावसायिक मॉडल को लेकर लंबे समय से चल रही बहस के बीच, सरकार ने फिलहाल आम जनता और व्यापारियों के लिए इस सेवा को मुफ्त रखने का फैसला बरकरार रखा है। हालांकि कई पेमेंट कंपनियां मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने की मांग कर रही थीं, लेकिन सरकार ने 50 करोड़ से अधिक यूजर्स के हितों को ध्यान में रखते हुए फिलहाल किसी भी प्रकार का शुल्क न लगाने का निर्णय लिया है। इसके बजाय, केंद्रीय बजट 2026-27 में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए 2,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो बैंकों और थर्ड-पार्टी ऐप्स को प्रोत्साहन के रूप में दिया जाएगा।
संसद में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा वित्त वर्ष के दिसंबर तक UPI के जरिए 230 लाख करोड़ रुपये का विशाल लेनदेन हुआ है। नकद पर निर्भरता कम करने और पारदर्शी अर्थव्यवस्था बनाने में UPI की भूमिका ऐतिहासिक रही है। आरबीआई के इस नए सुधार से तकनीकी दिक्कतों (Transaction Failures) में भारी कमी आएगी, जिससे ग्राहकों का भरोसा और अधिक मजबूत होगा। आगामी तकनीकी सुधारों के बाद UPI न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर एक सुरक्षित और तेज भुगतान विकल्प के रूप में अपनी स्थिति और सुदृढ़ करेगा।

