भारत में तेजी से बढ़ते सायबर अपराधों ने अब केवल व्यक्तिगत नुकसान की सीमा पार नहीं की है, बल्कि यह राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक विश्वास के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में व्यक्त की गई चिंता इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की न्यायिक चेतना इस संकट को साधारण धोखाधड़ी नहीं, बल्कि संगठित लूट और डकैती के रूप में देख रही है. यह दृष्टि न केवल उचित है, बल्कि समय की मांग भी है.
इंटरनेट के विस्तार ने नागरिकों को सुविधा दी है, लेकिन इसी सुविधा का दुरुपयोग कर अपराधियों ने एक नया भय पैदा किया है, जिसे आम भाषा में आभासी गिरफ्तारी कहा जा सकता है. भय, भ्रम और अधिकार के नकली प्रदर्शन के सहारे लोगों से जीवन भर की कमाई निकलवा ली जाती है. लगभग चौवन हजार करोड़ रुपये की ठगी यह साबित करती है कि यह अपराध कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित तंत्र बन चुका है. सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि इतनी बड़ी राशि कई राज्यों के वार्षिक बजट से अधिक है, व्यवस्था को झकझोरने वाला सत्य है.
न्यायालय का पहला निर्देश कि गृह मंत्रालय चार सप्ताह के भीतर मानक कार्यप्रणाली तैयार करे, अत्यंत आवश्यक है. अभी तक विभिन्न संस्थाएं अपने-अपने नियमों के अनुसार काम कर रही थीं, जिससे अपराधियों को कानूनी खामियों का लाभ मिलता रहा. एक एकीकृत कार्यप्रणाली, जिसमें बैंकिंग व्यवस्था और दूरसंचार तंत्र दोनों के स्पष्ट दायित्व तय हों, जांच और रोकथाम को प्रभावी बनाएगी. समझौता ज्ञापन का प्रस्ताव यह सुनिश्चित करेगा कि संस्थागत समन्वय केवल कागजों तक सीमित न रहे.
बैंकों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. बैंक केवल लाभ कमाने वाली संस्थाएं नहीं, बल्कि जनता की जमा पूंजी के संरक्षक हैं. यदि कोई बुजुर्ग या पेंशनभोगी अचानक असामान्य रूप से बड़ी राशि निकालता है, तो यह केवल लेनदेन नहीं, एक चेतावनी होनी चाहिए. एआई आधारित निगरानी प्रणाली के उपयोग का निर्देश भविष्य की सुरक्षा की दिशा में ठोस कदम है. इससे धोखाधड़ी होने से पहले ही उसे रोका जा सकता है. साथ ही, बैंक अधिकारियों की लापरवाही या संलिप्तता पर कठोर दंड की बात यह स्पष्ट करती है कि जवाबदेही अब टाली नहीं जा सकती.
पीडि़तों के लिए मुआवजा ढांचे की बात न्याय की मानवीय आत्मा को दर्शाती है. अक्सर देखा गया है कि ठगी के बाद पीडि़त न केवल आर्थिक रूप से टूटता है, बल्कि लंबी कानूनी प्रक्रिया से मानसिक रूप से भी थक जाता है. भारतीय रिजर्व बैंक और दूरसंचार विभाग को संयुक्त रूप से मुआवजा व्यवस्था बनाने का निर्देश यह स्वीकार करता है कि गलती केवल पीडि़त की नहीं होती, बल्कि प्रणाली की भी होती है.
जांच की जिम्मेदारी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपना और राज्यों को शीघ्र अनुमति देने का निर्देश इस अपराध की राष्ट्रीय प्रकृति को स्वीकार करने जैसा है. आभासी दुनिया में सीमाएं नहीं होतीं, इसलिए जांच एजेंसियों को भी सीमाओं से मुक्त होकर काम करना होगा. इसके साथ ही उच्च स्तरीय अंतर-विभागीय समिति का गठन यह संकेत देता है कि सरकार भी इस खतरे को गंभीरता से ले रही है.
कुल मिलाकर, सर्वोच्च न्यायालय की चिंता और उसके निर्देश न केवल उचित हैं, बल्कि देर से उठाया गया आवश्यक कदम हैं. यदि इन्हें ईमानदारी से लागू किया गया, तो सायबर अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगेगा और नागरिकों का भरोसा दोबारा मजबूत होगा. न्यायपालिका ने दिशा दिखा दी है, अब जिम्मेदारी कार्यपालिका और संस्थानों की है कि वे इस भरोसे को टूटने न दें.
