
नई दिल्ली, 30 अक्टूबर 2025 : न्यायपालिका के इतिहास में एक बड़ा टकराव सामने आया है, जहाँ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट को कड़े शब्दों में नसीहत दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सुप्रीम कोर्ट को जिला अदालतों के मामलों से “दूर रहना चाहिए” (हैंड्स-ऑफ अप्रोच)। यह पूरा घमासान राज्य के न्यायिक अधिकारियों के सेवा नियमों को लेकर छिड़ा है। हाईकोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने संविधान पीठ के सामने तीखी दलीलें देते हुए सवाल किया कि हाईकोर्ट को उसके संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों से वंचित क्यों किया जा रहा है, और यह बात अब बहुत आगे बढ़ चुकी है।
वरिष्ठ अधिवक्ता द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 227(1) के तहत जिला न्यायपालिका पर निगरानी का अधिकार हाईकोर्ट का है, इसलिए भर्ती, प्रमोशन या सेवानिवृत्ति आयु जैसे सेवा नियम बनाने का हक भी हाईकोर्ट का ही होना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि जिला न्यायाधीशों की भर्ती, उनकी सेवानिवृत्ति की आयु या प्रमोशन कोटा जैसे मामलों में शीर्ष अदालत को दखल नहीं देना चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट को हाईकोर्ट को कमजोर करने की जगह मजबूत करना चाहिए।
यह पूरा विवाद जिला न्यायाधीश के पद पर होने वाली पदोन्नति (Promotion Quota) को लेकर है। वर्तमान में यह तीन तरीकों (वरिष्ठता-आधारित, सीधी भर्ती और सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा) से होता है, जिसका अनुपात 50:25:25 है। इलाहाबाद हाईकोर्ट इस लड़ाई में अकेला नहीं है; पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट सहित केरल, बिहार और दिल्ली के प्रतिनिधियों ने भी बदलाव का विरोध किया है। द्विवेदी ने अंत में कहा कि सुप्रीम कोर्ट को तभी दखल देना चाहिए जब कहीं न्यायिक व्यवस्था चरमरा जाए, क्योंकि हर राज्य के नियम अलग होते हैं।
