जनजातीय वर्ग की चिंता

मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगू भाई पटेल द्वारा जनजातीय वर्ग के प्रति सरकारी तंत्र के रवैये पर जताई गई नाराजगी केवल एक औपचारिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उस कड़वी सच्चाई का आईना है, जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा है. जब राज्य का संवैधानिक प्रमुख सार्वजनिक मंच से यह कहे कि अफसरों के व्यवहार में ‘अपनेपन की कमी’ है और आदिवासी अब भी शोषण का शिकार हैं, तो इसे हल्के में लेना शासन और प्रशासन दोनों के लिए घातक होगा.

मध्यप्रदेश जैसे राज्य में, जहां लगभग 21 प्रतिशत आबादी जनजातीय वर्ग से आती है, वहां ट्राइबल सब प्लान (पीएसपी) का प्रभावी क्रियान्वयन केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की बुनियादी शर्त है। ऐसे में यह तथ्य कि वर्ष 2025-26 में टीएसपी के तहत आवंटित राशि का 22 प्रतिशत,यानी 299 करोड़ रुपये से अधिक,खर्च ही नहीं हो पाया और वापस चला गया, न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह उन लोगों के साथ अन्याय है, जिनके नाम पर यह बजट निर्धारित किया गया था.

राज्यपाल का यह सवाल कि क्या ट्राइबल बच्चे सिर्फ डांस करने के लिए होते हैं ? व्यवस्था पर सीधा प्रहार है.यह टिप्पणी प्रतीकात्मक जरूर है, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश गहरा है कि क्या हम जनजातीय समुदाय को केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन तक सीमित कर रहे हैं, या उनके शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए गंभीर प्रयास भी कर रहे हैं ? यदि योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रहें और जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव न दिखे, तो यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की संवेदनहीनता को उजागर करता है.

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि टीएसपी के धन के उपयोग में स्वयं ट्राइबल विभाग की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जा रही. यह न केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि है, बल्कि नीति निर्माण की आत्मा के विरुद्ध भी है. जिनके लिए योजनाएं बन रही हैं, उनकी जरूरतों और प्राथमिकताओं को दरकिनार कर दिया जाए, तो विकास का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है.

राज्यपाल ने तेलंगाना और कर्नाटक का उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि जहां जवाबदेही तय होती है, वहां परिणाम भी सामने आते हैं. यदि तय राशि समय पर खर्च नहीं होती, तो संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की जाती है. मध्यप्रदेश में भी अब इसी तरह की सख्ती की आवश्यकता है. वर्क ऑर्डर समय पर जारी हों, योजनाओं की नियमित मॉनिटरिंग हो और सबसे महत्वपूर्ण,जिम्मेदारी तय हो.

नौकरशाही पर लगाम कसने का अर्थ केवल दंडात्मक कार्रवाई नहीं है, बल्कि एक ऐसी कार्यसंस्कृति विकसित करना है, जिसमें संवेदनशीलता, जवाबदेही और परिणाम की स्पष्ट अपेक्षा हो. अफसरों को यह समझना होगा कि वे केवल फाइलों के प्रबंधक नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों के जीवन में बदलाव लाने वाले माध्यम हैं.

राज्यपाल की नाराजगी एक चेतावनी है कि यदि अब भी सुधार नहीं किया गया, तो योजनाएं और बजट केवल आंकड़ों का खेल बनकर रह जाएंगे. सरकार और प्रशासन को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि जनजातीय समाज के विकास के लिए निर्धारित हर रुपये का सही और समयबद्ध उपयोग हो. यही सच्चे अर्थों में सुशासन और सामाजिक न्याय की कसौटी है.

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