ऑटिज़्म अवेयरनेस डे: हर बच्चे को प्यार, सम्मान और अवसर मिलना चाहिए

देश में बढ़ रहे हैं ऑटिज़्म के मामलेः जागरूकता और समय पर थेरेपी है समाधान !

स्पीच, फोकस और व्यवहार सुधार में मददगारः सेंसरी इंटीग्रेशन थेरेपी और ब्रोन जिम थेरेपी ।।

ऑटिज़्म (Autism) क्या है?

ऑटिज़्म, जिसे ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (Autism Spectrum Disorder – ASD) कहा जाता है, एक न्यूरोडेवलप् (मस्तिष्क विकास से जुड़ा) विकार है। यह व्यक्ति के व्यवहार, सामाजिक संपर्क, संचार (बोलचाल), और सीखने क को प्रभावित करता है।

एम्स दिल्ली की रिसर्च के अनुसार भारत में 36 में से एक बच्चे को कोविड के बाद ऑटिज्म के लक्षण दिख रहे हे, यह लड़कियों की तुलना में दो गुना अधिक होता है।

ऑटिज़्म के मुख्य लक्षणः

सामाजिक और संचार संबंधी कठिनाइयाँ:

आँखों में आँखें न मिलाना

– दूसरों से घुलने-मिलने से बचना
– बातचीत में देरी या असामान्य ढंग से बोलना
– किसी एक ही विषय में अधिक रुचि रखना

बर्ताव और रुचियों में दोहरावः

– एक ही काम को बार-बार करना (जैसे हाथ हिलाना, घूमना, ताली बजाना)
– किसी खास चीज़ (जैसे खिलौना, पंखा, रोशनी) में बहुत रुचि लेना
अचानक गुस्सा आना या बेचैनी महसूस करना

सेंसरी (इंद्रियों से जुड़ी) समस्याएँ:
– किसी खास आवाज़, रोशनी, गंध, या स्पर्श से असहज महसूस करना
– तेज़ आवाज़ या भीड़-भाड़ वाली जगहों से बचना
– कुछ खाने-पीने की चीज़ों को नापसंद करना

ऑटिज़्म का कारण क्या है?

जेनेटिक कारण – परिवार में पहले से ऑटिज़्म का इतिहास होना
न्यूरोलॉजिकल कारण – मस्तिष्क के कुछ हिस्सों का अलग तरह से विकसित होना
पर्यावरणीय कारण – गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, प्रदूषण, या कुछ दवाओं का असर
आज भी ऑटिज़्म को एक कलंक माना जाता है। कई लोग इसे भूत-प्रेत बाधा समझते हैं या मानते हैं कि बच्चे में व और अक्सर इसका दोष माता पर डाल दिया जाता है।
ऑटिज़्म को लेकर जागरूकता और स्वीकार्यता बेहद जरूरी है, ताकि अंधविश्वास और गलत धारणाओं को खत्तम सके और ऑटिस्टिक बच्चों को सही समझ और सहयोग मिल सके।

ऑटिज़्म एक्सेप्टेंस (स्वीकार्यता) क्यों ज़रूरी है?
1. समाज में जागरूकता बढ़ाने के लिए
– अभी भी कई लोग ऑटिज़्म को गलत नजरिए से देखते हैं और इसे भूत-प्रेत बाधा या मानसिक बीमारी मानते हैं जागरूकता से इन मिथकों को दूर किया जा सकता है।
2. ऑटिस्टिक व्यक्तियों को समान अवसर देने के लिए
– ऑटिज़्म से प्रभावित बच्चों और वयस्कों को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक गतिविधियों में समान अवसर मिल ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।

भेदभाव और सामाजिक कलंक को खत्म करने के लिए
– ऑटिस्टिक बच्चों को अक्सर अलग-थलग कर दिया जाता है या उनका मज़ाक उड़ाया जाता है। एक्सेप्टेंस से सम बेहतर समझ सकेगा और उन्हें अपनाएगा।
. परिवारों का मनोबल बढ़ाने के लिए
– जब समाज ऑटिज़्म को स्वीकार करेगा, तो अभिभावकों को भी भावनात्मक समर्थन मिलेगा और वे बिना किस सही थेरेपी और संसाधनों की मदद ले पाएंगे।
सक्षम व्यक्तित्व और प्रतिभाओं को निखारने के लिए
– कई ऑटिस्टिक व्यक्ति असाधारण प्रतिभा वाले होते हैं। सही माहौल और सपोर्ट से वे विज्ञान, कला, गणित, संगीत अन्य क्षेत्रों में बेहतरीन योगदान दे सकते हैं।
. सकारात्मक और समावेशी समाज बनाने के लिए
ऑटिज़्म एक्सेप्टेंस से एक ऐसा समाज बनेगा, जहां हर व्यक्ति की विशेषताओं और क्षमताओं को स्वीकार किया ज चाहे वे अलग ही क्यों न हों।

कैसे बढ़ाएं ऑटिज़्म एक्सेप्टेंस?
स्कूलों और कार्यस्थलों में समावेशी नीतियां बनाएं अभिभावकों और शिक्षकों को प्रशिक्षित करें ऑटिस्टिक व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनने के अवसर दें
करुणा और समझदारी के साथ पेश आएं
“ऑटिज्म एक्सेप्टेंस सिर्फ एक दिन की मुहिम नहीं, बल्कि एक सोच है, जो समाज को ज्यादा समावेशी और संवेदनश सकती है!”
ऑटिज़्म से जुड़े मिथक और सच्चाई
मिथः बच्चे को भूत-प्रेत बाधा है।
सच्चाई: ऑटिज़्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल विकार है, जिसका भूत-प्रेत से कोई संबंध नहीं है। यह मस्तिष्क के विक जुड़ी एक वैज्ञानिक स्थिति है।
मिथः ऑटिस्टिक लोगों में सीखने की अक्षमता होती है।
सच्चाई: हर ऑटिस्टिक व्यक्ति अलग होता है। कुछ को सीखने में कठिनाई हो सकती है, लेकिन कई में असाधान प्रतिभाएँ भी होती हैं।
मिथः ऑटिज़्म खराब पेरेंटिंग के कारण होता है।
सच्चाई: यह पूरी तरह गलत है। ऑटिज़्म का कारण जेनेटिक्स और न्यूरोलॉजिकल कारक होते हैं, न कि पेरेंटिंग
मिथः टीके (Vaccines) ऑटिज़्म का कारण बनते हैं।

सच्चाई: अब तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है जो यह साबित करे कि वैक्सीनेशन ऑटिज़्म का कारण बन केवल एक मिथक है।

मिथः ऑटिज़्म से पीड़ित व्यक्ति कोई भावना महसूस नहीं कर सकते या दूसरों की भावनाओं को नहीं समझ सक

सच्चाई: ऑटिस्टिक व्यक्ति भावनाएँ महसूस कर सकते हैं, लेकिन वे उन्हें व्यक्त करने में कठिनाई महसूस कर स
मिथः ऑटिज़्म ठीक नहीं हो सकता।
सच्चाई: सही थेरेपी, सपोर्ट और प्रशिक्षण से व्यक्ति की जीवन गुणवत्ता में काफी सुधार एवं ठीक किया जा सकत

ऑटिज़्म का उपचार
ऑटिज़्म सही थेरेपी से बच्चों में सुधार लाया जा सकता है। उपचार में न्यूरोपीडियाट्रिशन, ऑक्युपेशनल थेरेपी, स्पीचा और

बिहेवियरल थेरेपी की भूमिका अहम होती है। मुख्य थेरेपी विधियाँ:
सेंसरी इंटीग्रेशन
न्यूरो डेवलपमेंटल इंटीग्रेशन
कोर डेवलपमेंट प्रोग्राम
ओरल प्लेसमेंट एक्टिविटी
आज के समय में ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) बच्चों में तेजी से पहचाना जा रहा है। ऐसे बच्चों में अक्सर स्पीच नि रिपिटेटिव बिहेवियर, ध्यान की कमी और सेंसरी प्रोसेसिंग की समस्या देखने को मिलती है। इन चुनौतियों को समझने और में सेंसरी इंटीग्रेशन थेरेपी और ब्रेन जिम एक्सरसाइज महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

क्या है सेंसरी इंटीग्रेशन?
सेंसरी इंटीग्रेशन वह प्रक्रिया है जिसमें हमारा मस्तिष्क इंद्रियों (जैसे स्पर्श, ध्वनि, दृश्य, संतुलन आदि) से आने वाली जानव समझकर उचित प्रतिक्रिया देता है।
सेंसरी इंटीग्रेशन थेरेपी कैसे काम करती है?
इस थेरेपी में बच्चे को विभिन्न प्रकार के सेंसरी अनुभव दिए जाते हैं, जैसेः
स्विंग (झूला) और बैलेंस एक्टिविटी
डीप प्रेशर (गहरा दबाव)
टेक्सचर एक्सप्लोरेशन (अलग-अलग सतहों को छूना)

इन गतिविधियों सेः
मस्तिष्क सेंसरी इनपुट को बेहतर तरीके से प्रोसेस करना सीखता है
बच्चे की ध्यान क्षमता और व्यवहार नियंत्रण में सुधार आता है
मोटर स्किल्स और कोऑर्डिनेशन बेहतर होता है
ब्रेन जिम एक्सरसाइज क्या हैं?
ब्रेन जिम एक्सरसाइज ऐसी सरल गतिविधियाँ हैं जो दिमाग के दोनों हिस्सों (left & right brain) को सक्रिय करती हैं और बीच तालमेल बढ़ाती हैं।
कुछ प्रमुख एक्सरसाइजः
क्रॉस क्रॉल (Cross Crawl)
ब्रेन बटन
हुक-अप्स
फोकस एक्सरसाइज
दोनों थेरेपी का संयुक्त प्रभाव
जब सेंसरी इंटीग्रेशन और ब्रेन जिम को साथ में किया जाता है, तो इसका प्रभाव और अधिक सकारात्मक होता है:
बच्चे की कॉग्निटिव स्किल्स तेज़ी से विकसित होती हैं
व्यवहार में सुधार और सामाजिक सहभागिता बढ़ती है
सीखने की गति और समझ में वृद्धि होती है
सेंसरी इंटीग्रेशन और ब्रेन जिम एक्सरसाइज, ऑटिज़्म से जूझ रहे बच्चों के लिए एक मजबूत आधार तैयार करती हैं।
सही मार्गदर्शन, नियमित अभ्यास और परिवार के सहयोग से ये बच्चे भी एक सफल और आत्मनिर्भर जीवन जी सकते हैं

अभिभावकों के लिए सुझाव

1. बच्चों को जंक फूड, मैदा और मीठे पदार्थ न दें।
2. स्क्रीन टाइम (मोबाइल/टीवी) कम से कम रखें।
3. बच्चे की समस्या को स्वीकारें और सही समय पर विशेषज्ञ से परामर्श लें।
4. सोशल मीडिया से प्रभावित होकर घर पर स्वयं इलाज करने से बचें।
5. प्रमाणित और अनुभवी विशेषज्ञों से ही थेरेपी करवाएँ।
ऑटिज़्म को सही समझ और थेरेपी से उपचार किया जा सकता है। जागरूकता और सही समय पर उपचार से इन बच्च जीवन स्वस्थ एवं बेहतर बनाया जा सकता है।
प्रमाणित और अनुभवी विशेषज्ञों से ही थेरेपी करवाएँ।
ऑटिज़्म को सही समझ और थेरेपी से उपचार किया जा सकता है। जागरूकता और सही समय पर उपचार से इन बच्च जीवन स्वस्थ एवं बेहतर बनाया जा सकता है।

डॉ सुभाष गर्ग

Clinical Occupational Therapist & Autism Expert
MOT (Neuro) PGDMH (CMC Vellore) M.A. Psychology Head Member Of National Allied Health Council (M.P.)
Professor SRI Aurobindo Institute of Medical Sciences Indore

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