धार स्थित भोजशाला विवाद पर इंदौर हाई कोर्ट का हालिया फैसला केवल एक धार्मिक स्थल के स्वामित्व या पूजा-अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में इतिहास, आस्था और संवैधानिक व्यवस्था के जटिल संबंधों को भी सामने लाता है. अदालत ने एएसआई सर्वे और उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर भोजशाला परिसर को मंदिर स्वरूप का माना है तथा हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार दिया है. साथ ही एएसआई को परिसर की निगरानी जारी रखने के निर्देश भी दिए गए हैं. स्वाभाविक रूप से इस निर्णय के बाद हिंदू संगठनों में उत्साह है, जबकि मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की है. ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता संयम और संवैधानिक मर्यादा बनाए रखने की है.
भोजशाला का इतिहास सदियों पुराना माना जाता है. इसे राजा भोज के समय संस्कृत शिक्षा और मां वाग्देवी की उपासना का केंद्र बताया जाता रहा है. हिंदू पक्ष ने शिलालेखों, स्थापत्य संरचनाओं, गजेटियर और एएसआई रिपोर्ट के आधार पर यह दावा रखा कि परिसर मूलत: मंदिर था. दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष का तर्क रहा कि यह स्थल लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में भी उपयोग में रहा है और मौजूदा व्यवस्था सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए बनाई गई थी. यही कारण है कि यह विवाद केवल पुरातात्विक या धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता से भी जुड़ा हुआ है.
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में एएसआई के 2003 के उस आदेश को आंशिक रूप से निरस्त किया है, जिसमें नमाज की अनुमति दी गई थी. अदालत ने केंद्र सरकार को यह भी सुझाव दिया कि यदि आवश्यक हो तो मुस्लिम पक्ष के लिए वैकल्पिक भूमि पर विचार किया जा सकता है. बहरहाल, इस मामले में यह ध्यान रखना होगा कि विवाद अभी अंतिम रूप से समाप्त नहीं हुआ है. मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह उसका संवैधानिक अधिकार है. दरअसल,भारत जैसे विविधताओं वाले देश में धार्मिक विवादों का समाधान केवल कानूनी फैसलों से नहीं, बल्कि सामाजिक परिपक्वता से भी तय होता है. अयोध्या प्रकरण के बाद देश ने देखा कि लंबे विवाद के बावजूद समाज ने व्यापक शांति और संयम का परिचय दिया. भोजशाला मामले में भी वही जिम्मेदारी अपेक्षित है. किसी भी पक्ष की विजय को दूसरे पक्ष की पराजय के उत्सव में बदलना सामाजिक सौहार्द के लिए ठीक नहीं होगा. अदालतों का काम साक्ष्यों और कानून के आधार पर निर्णय देना है, जबकि समाज का दायित्व आपसी विश्वास बनाए रखना है.
यह भी महत्वपूर्ण है कि इतिहास की व्याख्या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम न बने. भारत की सभ्यता बहुस्तरीय रही है, जहां अनेक कालखंडों की परंपराएं एक-दूसरे से जुड़ती और टकराती भी रही हैं. ऐसे विवादों में राजनीतिक बयानबाजी या उग्र प्रदर्शन स्थिति को जटिल बना सकते हैं. राज्य सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए किसी भी प्रकार की उत्तेजना को रोका जाए.
भोजशाला पर हाई कोर्ट का फैसला निश्चित रूप से ऐतिहासिक महत्व रखता है, लेकिन अंतिम संवैधानिक शब्द अभी सुप्रीम कोर्ट को कहना है. इसलिए दोनों पक्षों को न्यायिक प्रक्रिया पर विश्वास रखते हुए धैर्य और संयम बनाए रखना चाहिए. लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि आस्था के प्रश्न भी कानून और संवाद की चौखट के भीतर सुलझाए जाएं.
