भारत में सडक़ें चौड़ी हो रही हैं, एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, गाडिय़ों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है, लेकिन सडक़ पर चलने की संस्कृति अब भी बेहद अव्यवस्थित है. यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट को यह टिप्पणी करनी पड़ी कि भारत में ‘लेन ड्राइविंग’ जैसी कोई अवधारणा ही नहीं बची है. अदालत की यह टिप्पणी केवल कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि देश की सडक़ व्यवस्था का कठोर सामाजिक और प्रशासनिक सच है.
देश में हर दिन औसतन 546 लोगों की सडक़ दुर्घटनाओं में मौत होना किसी युद्ध जैसी स्थिति से कम नहीं है. एनसीआरबी के अनुसार वर्ष 2024 में लगभग 1.99 लाख लोगों की जान सडक़ हादसों में गई. यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के उजडऩे, बच्चों के अनाथ होने और देश की आर्थिक उत्पादकता पर भारी चोट का प्रतीक है. सडक़ दुर्घटनाओं की सामाजिक और आर्थिक लागत भारत की जीडीपी का 3.14 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. यह बताता है कि सडक़ सुरक्षा केवल ट्रैफिक विभाग का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास और मानव सुरक्षा का मुद्दा है.
सबसे गंभीर बात यह है कि दुर्घटनाओं का बड़ा कारण तकनीकी कमी नहीं, बल्कि अनुशासनहीनता है. भारत में अधिकांश लोग लेन अनुशासन का पालन नहीं करते. ओवरटेकिंग की होड़, गलत दिशा में वाहन चलाना, बिना संकेत लेन बदलना, तेज गति और मोबाइल फोन का उपयोग आज आम दृश्य बन चुके हैं. सडक़ें नियमों से नहीं, बल्कि ‘जुगाड़ मानसिकता’ से संचालित होती दिखाई देती हैं. यही अव्यवस्था दुर्घटनाओं को जन्म देती है.बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक वाहनों में ट्रैकिंग डिवाइस और पैनिक बटन नहीं लगाए जाने पर भी चिंता जताई है. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनिवार्य नियम होने के बावजूद देश में एक प्रतिशत से भी कम सार्वजनिक वाहनों में ये सुरक्षा उपकरण लगे हैं. यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा के प्रति गंभीर उदासीनता है. यदि बसों और सार्वजनिक वाहनों में रियल-टाइम ट्रैकिंग और इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम प्रभावी ढंग से लागू हो जाएं, तो दुर्घटनाओं और अपराध दोनों को काफी हद तक रोका जा सकता है.
दोपहिया वाहन दुर्घटनाओं में 48 प्रतिशत से अधिक मौतें होना भी चिंताजनक संकेत है. हेलमेट न पहनना, तीन सवारी बैठाना और तेज गति से वाहन चलाना युवाओं में ‘स्टाइल’ का हिस्सा बन चुका है. दरअसल,सडक़ सुरक्षा को कानून के डर से नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करना होगा.
यह भी ध्यान देने योग्य है कि सबसे अधिक दुर्घटनाएं शाम 6 बजे से रात 9 बजे के बीच होती हैं. इसका अर्थ है कि ट्रैफिक प्रबंधन, स्ट्रीट लाइट, पुलिस निगरानी और ड्राइवर थकान जैसे मुद्दों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 60 प्रतिशत हादसे होना यह दर्शाता है कि सडक़ सुरक्षा अभियान केवल महानगरों तक सीमित नहीं रह सकते.
भारत को अब सडक़ निर्माण के साथ ‘सडक़ संस्कृति’ निर्माण पर भी उतना ही ध्यान देना होगा. स्कूलों में ट्रैफिक शिक्षा, सख्त जुर्माना, तकनीकी निगरानी और लाइसेंस प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है. सडक़ पर अनुशासन केवल कानून से नहीं, बल्कि नागरिक चेतना से आएगा. यदि यह नहीं बदला, तो आधुनिक हाईवे भी मौत के रास्ते बनते रहेंगे.
