नीट ; उदाहरण पेश करने का समय

देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी 2026 का रद्द होना केवल एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है. यह उस व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है, जो करोड़ों युवाओं को ‘मेहनत करो, सिस्टम निष्पक्ष है’ का भरोसा देती रही. राजस्थान के सीकर से लेकर हरियाणा के गुरुग्राम और महाराष्ट्र के नासिक तक फैला यह पेपर लीक नेटवर्क बताता है कि अब शिक्षा माफिया केवल कोचिंग सेंटरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह डिजिटल नेटवर्क, प्रिंटिंग प्रेस, दलालों और संगठित गिरोहों के रूप में पूरे सिस्टम में घुस चुका है.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर 22 लाख छात्रों के भविष्य की सुरक्षा करने वाली एजेंसी एनटीए बार-बार कटघरे में क्यों खड़ी हो जाती है ? 2024 में भी नीट पेपर लीक हुआ था. तब दलील दी गई कि प्रभाव ‘सीमित’ था, इसलिए परीक्षा रद्द नहीं होगी. लेकिन 2026 में मामला इतना व्यापक निकला कि सरकार को पूरी परीक्षा ही रद्द करनी पड़ी. इसका अर्थ साफ है कि या तो पिछली बार सच छिपाया गया था या फिर उससे कोई सबक नहीं लिया गया.

यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संस्थागत पतन का मामला है. जिस परीक्षा के लिए छात्र वर्षों तक दिन-रात मेहनत करते हैं, परिवार अपनी जमा पूंजी कोचिंग और हॉस्टल पर खर्च करते हैं, वही परीक्षा कुछ लाख रुपये में बाजार में बिक जाए, तो यह सीधे-सीधे ईमानदार युवाओं के साथ धोखा है. सीकर में ‘गेस पेपर’ के नाम पर असली प्रश्नपत्र बेचे जा रहे थे. बायोलॉजी के 90 में 90 सवाल मैच होना कोई संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित अपराध है. और जाहिर है यह अपराध केवल कुछ दलालों का नहीं है. सवाल उन संस्थाओं पर भी उठता है जिनके पास प्रश्नपत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी. नासिक की प्रिंटिंग प्रेस से पेपर का बाहर निकलना बताता है कि सुरक्षा व्यवस्था या तो बेहद कमजोर थी या फिर भीतर से मिलीभगत मौजूद थी. यदि देश की सबसे संवेदनशील परीक्षाओं के प्रश्नपत्र सुरक्षित नहीं हैं, तो फिर डिजिटल इंडिया और परीक्षा सुधारों के बड़े-बड़े दावे खोखले लगते हैं.

सरकार ने सीबीआई जांच सौंपकर सही कदम उठाया है, लेकिन अब केवल गिरफ्तारी से काम नहीं चलेगा. हर साल कुछ छोटे आरोपी पकड़ लिए जाते हैं, कुछ दिन टीवी डिबेट होती है और फिर सिस्टम पुराने ढर्रे पर लौट जाता है. जरूरत है कि इस बार पूरे नेटवर्क को ध्वस्त किया जाए. जिन अधिकारियों, प्रिंटिंग एजेंसियों और तकनीकी कर्मियों की भूमिका संदिग्ध है, उन पर भी वैसी ही कठोर कार्रवाई होनी चाहिए जैसी पेपर बेचने वालों पर होगी.

दुनिया के कई देशों ने परीक्षा माफिया के खिलाफ कठोर कानून बनाए हैं. चीन में इसे लगभग राष्ट्रविरोधी अपराध माना जाता है. दक्षिण कोरिया और बांग्लादेश में आजीवन ब्लैक लिस्टिंग तक का प्रावधान है. भारत में भी सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2024 लागू हुआ है, लेकिन कानून तभी प्रभावी होगा जब दोषियों को त्वरित और सार्वजनिक सजा मिले.

सबसे दुखद पक्ष यह है कि इस पूरे कांड का सबसे बड़ा बोझ उन छात्रों पर पड़ेगा जिनकी कोई गलती नहीं है. दोबारा परीक्षा, मानसिक तनाव, आर्थिक बोझ और भविष्य की अनिश्चितता, यह सब उस पीढ़ी को झेलना पड़ रहा है जो डॉक्टर बनकर देश की सेवा करना चाहती है. दरअसल,अब देश को केवल ‘री-एग्जाम’ नहीं, बल्कि ‘री-फॉर्म’ चाहिए. वरना हर साल परीक्षा होगी, पेपर लीक होगा, जांच होगी और अंत में टूटेंगे केवल छात्रों के सपने.

 

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