उपचार के इंतजार में दम तोड़ती व्यवस्थाएं

सीहोर। जिला मुख्यालय का सरकारी अस्पताल खुद बीमार नजर आ रहा है. हाल ही में शहर के एक निजी अस्पताल में नवप्रसूता की मौत के बाद एक बार फिर जिला अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े हो गए हैं. आमजन का कहना है कि यदि जिला अस्पताल में बेहतर इलाज, पर्याप्त डॉक्टर और जरूरी जांच सुविधाएं उपलब्ध हों, तो आखिर मरीज निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की ओर रुख क्यों करें.

जिला अस्पताल में वर्षों से अव्यवस्थाओं का आलम बना हुआ है. यहां इलाज कराने आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को डॉक्टरों के इंतजार से लेकर जांच सुविधाओं के अभाव तक कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. सबसे बड़ी समस्या सोनोग्राफी की है. अस्पताल में कई वर्षों से रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली पड़ा है, जिसके कारण मरीजों की सोनोग्राफी नहीं हो पा रही. मजबूरी में मरीजों को निजी सेंटरों का सहारा लेना पड़ता है, जहां उनसे मनमाने पैसे वसूले जाते हैं. गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर इसका सीधा आर्थिक बोझ पड़ रहा है. महिलाओं और गर्भवती मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ रही है. अस्पताल में समय पर जांच और उपचार नहीं मिलने के कारण उन्हें निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है. हाल ही में हुई नवप्रसूता की मौत ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। लोगों का कहना है कि यदि जिला अस्पताल में समुचित सुविधाएं और विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद होते, तो मरीजों को निजी अस्पतालों के भरोसे नहीं रहना पड़ता.

अस्पताल में डॉक्टरों और स्टाफ की कार्यप्रणाली को लेकर भी लगातार शिकायतें सामने आती रहती हैं. मरीजों का आरोप है कि डॉक्टर समय पर नहीं मिलते, वहीं कुछ कर्मचारी मरीजों से ठीक व्यवहार नहीं करते. घंटों लाइन में लगने के बाद भी मरीजों को सही इलाज नहीं मिल पाता. जरूरी दवाओं का अभाव भी लोगों की परेशानी बढ़ा रहा है.

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी भी बड़ी समस्या बनी हुई है. कई विभागों में पद रिक्त हैं, जिसके कारण मरीजों को रेफर किया जाता है या फिर निजी अस्पतालों में इलाज कराने की सलाह दी जाती है. ऐसे में गरीब मरीजों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है. लोगों का कहना है कि यदि जनप्रतिनिधि वास्तव में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर हैं, तो अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार करना होगा. वरना निजी अस्पतालों में मरीजों की जेब कटती रहेगी और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर होता जाएगा.

करोड़ों खर्च होने के बाद भी हालात जस के तस

स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से लेकर जिले के जनप्रतिनिधियों तक, सभी ने समय-समय पर अस्पताल की व्यवस्थाएं सुधारने के दावे किए, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं. करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा. जिले के लोगों का कहना है कि जब सरकारी अस्पताल में बुनियादी सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं होंगी, तो आमजन मजबूर होकर निजी अस्पतालों की शरण लेंगे.

कोई कमी है तो उसे तुरंत दूर करेंगे

जिला अस्पताल में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया हैं. फिर भी अगर कोई कमी है तो उसे दूर किया जाएगा.

डॉ. यूके श्रीवास्तव,
सिविल सर्जन

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