वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय अनिश्चितताओं के भंवर में फंसी हुई है, लेकिन भारत ने इस दौर में भी अपनी विकास गति को बनाए रखकर एक अलग मिसाल पेश की है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की ताजा रिपोर्टों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत न केवल स्थिर है, बल्कि वैश्विक सुस्ती के बीच भी मजबूती से आगे बढ़ रहा है. यह आकलन उन तमाम आशंकाओं और दावों पर सीधा प्रहार करता है, जिनमें भारतीय अर्थव्यवस्था के कमजोर पडऩे की बात कही जा रही थी.
पिछले कुछ महीनों में एक खास तरह का नैरेटिव गढऩे की कोशिश हुई कि भारत की आर्थिक रफ्तार थमने वाली है, छोटे और मध्यम उद्योग संकट में हैं और विकास की दिशा कमजोर हो रही है. राजनीतिक विमर्श में भी इन आशंकाओं को बार-बार दोहराया गया. लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों ने इन दावों की वास्तविकता उजागर कर दी है. जब आईएमएफ जैसे वैश्विक निकाय भारत की आर्थिक मजबूती को स्वीकार करते हैं, तो यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि नीतिगत स्थिरता और संरचनात्मक सुधारों की पुष्टि भी होती है.
आईएमएफ द्वारा वैश्विक विकास दर को घटाकर लगभग 3.1 प्रतिशत कर देना इस बात का संकेत है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं दबाव में हैं. यूरोप, अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख आर्थिक केंद्र भी विभिन्न कारणों से धीमी गति का सामना कर रहे हैं. युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई और सप्लाई चेन की बाधाएं, इन सभी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है. ऐसे समय में भारत का अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन अपने आप में महत्वपूर्ण है.
भारत की इस मजबूती के पीछे कई ठोस कारण हैं. सबसे पहला है मजबूत घरेलू मांग, जो वैश्विक झटकों के बावजूद अर्थव्यवस्था को सहारा देती है. दूसरा बड़ा कारक है डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, जिसने लेन-देन, सेवाओं और उद्यमिता को नई ऊर्जा दी है. तीसरा महत्वपूर्ण पहलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में हो रहे सुधार हैं, जिनमें ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं की भूमिका अहम रही है. इन प्रयासों ने भारत को केवल उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन केंद्र के रूप में भी स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ाया है.
हालांकि यह तस्वीर पूरी तरह चुनौतियों से मुक्त नहीं है. भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार ने भी संकेत दिया है कि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, निर्यात पर दबाव और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं. यह भी सच है कि भारत पूरी तरह वैश्विक प्रभावों से अछूता नहीं रह सकता.
फिर भी, यह मानना होगा कि भारत की अर्थव्यवस्था आज पहले की तुलना में कहीं अधिक लचीली और सक्षम बनी है. नीतिगत सुधार, बुनियादी ढांचे में निवेश और वित्तीय अनुशासन ने इसे झटकों को सहने की ताकत दी है. जरूरत इस बात की है कि सरकार इस गति को बनाए रखते हुए रोजगार सृजन, ग्रामीण आय और छोटे उद्योगों की मजबूती पर भी समान रूप से ध्यान दे. कुल मिलाकर आईएमएफ और विश्व बैंक की मुहर केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक संकेत है,भारत सही दिशा में बढ़ रहा है. अब चुनौती यह है कि इस गति को स्थायी और समावेशी विकास में कैसे बदला जाए, ताकि इसका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे.
