हिंद-प्रशांत में संतुलन की नई रणनीति

नई दिल्ली में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों की हालिया क्वॉड बैठक ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र अब केवल व्यापार और समुद्री गतिविधियों का केंद्र नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण मंच बन चुका है. बैठक में आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति, समुद्री सुरक्षा, उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम तथा महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित बनाने जैसे मुद्दों पर व्यापक सहमति बनी. विशेष रूप से ‘इंडो-पैसिफिक मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस’ जैसी पहलों को आगे बढ़ाने का निर्णय इस क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र का महत्व किसी से छिपा नहीं है. विश्व व्यापार का लगभग 75 प्रतिशत और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत समुद्री व्यापार का मार्ग भी यहीं से होकर गुजरता है. ऐसे में इस क्षेत्र की स्थिरता और सुरक्षा केवल सदस्य देशों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है. यही कारण है कि क्वॉड अब केवल एक रणनीतिक संवाद मंच नहीं रहा, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और सहयोग का प्रभावी माध्यम बनता जा रहा है.

क्वॉड की बढ़ती सक्रियता से चीन की बेचैनी भी लगातार बढ़ रही है. बीजिंग बार-बार इस मंच को ‘छोटे गुटों की राजनीति’ बताकर इसकी आलोचना करता रहा है. हालांकि वास्तविकता यह है कि दक्षिण चीन सागर से लेकर पूर्वी चीन सागर तक चीन की आक्रामक गतिविधियों, कृत्रिम द्वीपों के निर्माण और पड़ोसी देशों की समुद्री सीमाओं में हस्तक्षेप ने क्षेत्रीय देशों की चिंताओं को बढ़ाया है. अंतरराष्ट्रीय कानूनों और समुद्री नियमों की अनदेखी ने ही ऐसी परिस्थितियां पैदा की हैं, जिनके परिणामस्वरूप क्वॉड जैसे मंचों की आवश्यकता महसूस हुई.

क्वॉड की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि महत्वपूर्ण खनिजों, विशेषकर रेयर अर्थ मिनरल्स, की आपूर्ति शृंखला को लेकर साझा रणनीति तैयार करना है. वर्तमान में इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति में चीन का वर्चस्व है. इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरणों और उन्नत तकनीकी उत्पादों के निर्माण में इन खनिजों की केंद्रीय भूमिका है. ऐसे में वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत विकसित करने का प्रयास सदस्य देशों की आर्थिक और तकनीकी सुरक्षा को मजबूत करेगा.

यह भी उल्लेखनीय है कि क्वॉड किसी सैन्य गठबंधन के रूप में नहीं उभरा है. इसका घोषित उद्देश्य स्वतंत्र, मुक्त, समावेशी और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत व्यवस्था को प्रोत्साहित करना है. भारत के लिए क्वॉड का महत्व और भी अधिक है. एक ओर यह देश की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करता है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, तकनीकी सहयोग और आर्थिक साझेदारी के नए अवसर भी प्रदान करता है. क्वॉड की नई पहलें इस दिशा में सकारात्मक संकेत देती हैं. यदि सदस्य देश अपने आर्थिक, तकनीकी और सामरिक सहयोग को इसी प्रकार आगे बढ़ाते रहे, तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, संतुलन और सुरक्षा का नया अध्याय लिखा जा सकता है. चीन के लिए भी यही संदेश है कि वैश्विक नेतृत्व दबाव और विस्तारवाद से नहीं, बल्कि सहयोग और नियमों के सम्मान से प्राप्त होता है.

 

 

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