दुनिया की नई अर्थव्यवस्था में सेमीकंडक्टर वही स्थान रखते हैं, जो कभी औद्योगिक क्रांति के दौर में इस्पात और ऊर्जा का था. स्मार्टफोन, कंप्यूटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा प्रणाली, ऑटोमोबाइल, चिकित्सा उपकरण और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी,लगभग हर आधुनिक तकनीक की नींव सेमीकंडक्टर चिप्स पर टिकी है. ऐसे समय में केंद्र सरकार द्वारा 1.27 लाख करोड़ रुपए की लागत से सेमी कॉन 2.0 कार्यक्रम को मंजूरी देना केवल एक औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता और आर्थिक सुरक्षा की दिशा में दूरगामी कदम है.
कोविड महामारी और उसके बाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि चिप निर्माण में कुछ देशों पर अत्यधिक निर्भरता पूरी दुनिया के लिए जोखिम बन सकती है. भारत जैसे तेजी से बढ़ते डिजिटल राष्ट्र के लिए यह चुनौती और भी बड़ी थी. ऐसे में सरकार का लक्ष्य भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर निर्माण, डिजाइन और सप्लाई चेन का प्रमुख केंद्र बनाना समय की मांग भी है और रणनीतिक आवश्यकता भी.
सेमीकॉन 2.0 की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल चिप निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने का प्रयास करता है. चिप डिजाइन, कच्चे माल और उपकरणों का निर्माण, फैब्रिकेशन प्लांट, एडवांस्ड पैकेजिंग, अनुसंधान एवं विकास तथा कुशल मानव संसाधन तैयार करने जैसे छह प्रमुख स्तंभ इस कार्यक्रम को व्यापक बनाते हैं. विशेष रूप से 315 विश्वविद्यालयों में हजारों छात्रों को अत्याधुनिक ईडीए टूल्स के माध्यम से प्रशिक्षित करने की योजना भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है.
सरकार का अनुमान है कि इस नीति से लगभग 4 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित होगा और 2 लाख करोड़ रुपए मूल्य का सेमीकंडक्टर उत्पादन संभव होगा. यदि यह लक्ष्य हासिल होता है तो भारत न केवल अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ेगा, बल्कि वैश्विक बाजार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा. इससे लाखों प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार सृजित होंगे तथा उच्च तकनीक आधारित विनिर्माण को नई गति मिलेगी.
हालांकि इस महत्वाकांक्षी योजना की सफलता केवल बजट आवंटन से सुनिश्चित नहीं होगी. सेमीकंडक्टर उद्योग अत्यंत पूंजी-प्रधान, अनुसंधान आधारित और तकनीकी रूप से जटिल क्षेत्र है. इसमें निरंतर निवेश, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा, पर्याप्त बिजली और जल आपूर्ति, कुशल कार्यबल तथा नीति की स्थिरता अनिवार्य है. वैश्विक कंपनियों का विश्वास जीतने के साथ-साथ भारतीय स्टार्टअप और अनुसंधान संस्थानों को भी दीर्घकालिक सहयोग देना होगा.
कैबिनेट द्वारा मोबाइल विनिर्माण के लिए 62,500 करोड़ रुपए तथा वाराणसी के बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को दी गई मंजूरी यह संकेत देती है कि सरकार विनिर्माण और आधारभूत संरचना को समानांतर रूप से मजबूत करना चाहती है. यह दृष्टिकोण भारत को वैश्विक निवेश के लिए अधिक आकर्षक बना सकता है.
भारत आज डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के नए युग में प्रवेश कर रहा है. सेमीकॉन 2.0 इस परिवर्तन की आधारशिला बन सकता है. यदि केंद्र और राज्य सरकारें, उद्योग जगत, शैक्षणिक संस्थान तथा अनुसंधान संगठन समन्वित प्रयास करें, तो आने वाले वर्षों में भारत केवल चिप्स का उपभोक्ता नहीं, बल्कि दुनिया का विश्वसनीय निर्माता और नवाचार का प्रमुख केंद्र बनकर उभर सकता है. यही वास्तविक तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में सबसे मजबूत कदम होगा.
