देश इस वर्ष कमजोर मानसून की चुनौती का सामना कर रहा है. जून में सामान्य से 43 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई, जो पिछले सौ वर्षों के सबसे शुष्क जून महीनों में शामिल है. जुलाई के शुरुआती दिनों में हुई अच्छी बारिश से स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है, लेकिन मौसम विभाग का अनुमान अब भी सामान्य से कम वर्षा का संकेत देता है. ऐसे में यह स्पष्ट है कि केवल अच्छी बारिश की उम्मीद के भरोसे कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नहीं छोड़ा जा सकता. सरकार को दीर्घकालिक और व्यावहारिक कृषि नीति के साथ त्वरित राहत उपायों पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा.
भारत की कृषि आज भी बड़े पैमाने पर मानसून पर निर्भर है. देश की लगभग आधी कृषि भूमि ही सिंचित है, जबकि शेष क्षेत्र वर्षा आधारित खेती पर आश्रित है. ऐसे क्षेत्रों में वर्षा की कमी केवल फसल उत्पादन को प्रभावित नहीं करती, बल्कि किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालती है. बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, मराठवाड़ा तथा उत्तर-पश्चिम भारत जैसे क्षेत्रों में वर्षा की भारी कमी चिंता का विषय है. इन इलाकों में पहले से ही कृषि उत्पादकता कम और गरीबी अधिक है. कमजोर मानसून इन समस्याओं को और गंभीर बना सकता है.
इस वर्ष खरीफ फसलों की बुआई में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है. धान, दलहन, तिलहन और कपास जैसी प्रमुख फसलों का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम है. यदि आगामी दिनों में वर्षा की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ तो कृषि उत्पादन घटने की आशंका बढ़ जाएगी. इसका सीधा असर खाद्य महंगाई पर पड़ेगा. हालांकि देश में खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है, लेकिन दालों और तिलहनों के मामले में भारत पहले से ही आयात पर निर्भर है. उत्पादन में कमी से आयात बढ़ेगा और वैश्विक बाजार की कीमतों का दबाव भी घरेलू उपभोक्ताओं पर पड़ेगा.
चिंता का दूसरा बड़ा कारण जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव है. जलाशयों में जल स्तर घट रहा है और कई राज्यों में भूजल तेजी से नीचे जा रहा है. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में केवल मानसून आधारित कृषि भविष्य का समाधान नहीं हो सकती. सूक्ष्म सिंचाई, जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और फसल विविधीकरण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा. साथ ही कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली फसलों और उन्नत बीजों को बढ़ावा देना समय की मांग है.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है. खेती के अलावा ग्रामीण परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा गैर-कृषि गतिविधियों से आता है. इसलिए ग्रामीण रोजगार सृजन, लघु उद्योगों और आजीविका कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा. रोजगार गारंटी योजनाओं को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराकर उनका दायरा बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि कमजोर मानसून का असर ग्रामीण आय पर कम से कम पड़े. खाद्य सुरक्षा योजनाओं को भी पूरी संवेदनशीलता के साथ लागू करना आवश्यक है.
कमजोर मानसून केवल मौसम की चुनौती नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक परीक्षा भी है. यदि समय रहते सिंचाई, जल प्रबंधन, कृषि सुधार, ग्रामीण रोजगार और खाद्य सुरक्षा पर समन्वित नीति अपनाई जाए तो इस संकट को अवसर में बदला जा सकता है. कृषि को केवल बारिश के भरोसे छोडऩे का समय अब बीत चुका है. देश को बदलती जलवायु के अनुरूप अधिक टिकाऊ, आधुनिक और किसान-केंद्रित कृषि व्यवस्था विकसित करनी ही होगी.
