देश के प्रमुख जलाशयों में तेजी से घटता जल स्तर केवल मौसमी चिंता नहीं, बल्कि भविष्य के जल सुरक्षा संकट की चेतावनी है. मानसून का इंतजार जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है जल संरक्षण और प्रबंधन को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना. केंद्रीय जल आयोग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि मई के शुरुआती दिनों से लेकर महीने के अंत तक देश के 166 प्रमुख जलाशयों का जल भंडारण 36.41 प्रतिशत से घटकर 24.75 प्रतिशत पर पहुंच गया है. लगभग 21.4 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का कम हो जाना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले समय में जल उपलब्धता को लेकर खड़े हो रहे संकट का संकेत है. ऐसे समय में जब मौसम विभाग अल नीनो के प्रभाव के कारण सूखे की आशंका जता रहा है, जलाशयों की यह स्थिति और अधिक चिंताजनक हो जाती है.
भारत की जल व्यवस्था आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है. हर वर्ष गर्मियों के अंत तक जलाशयों का स्तर घटता है, लेकिन इस बार गिरावट की रफ्तार अपेक्षाकृत अधिक है. विशेष रूप से दक्षिण भारत में स्थिति गंभीर बनी हुई है. वहां जलाशयों में उपलब्ध पानी कुल क्षमता के केवल 17.55 प्रतिशत तक सिमट गया है. कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों में पेयजल और सिंचाई दोनों क्षेत्रों में दबाव बढऩे की आशंका है. यह स्थिति बताती है कि जल संकट अब केवल किसी एक क्षेत्र की समस्या नहीं रह गया, बल्कि राष्ट्रीय चुनौती का रूप ले रहा है.
सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि गंभीर संकट वाले बांधों की संख्या लगातार बढ़ रही है. मई की शुरुआत में जहां 11 बांध गंभीर श्रेणी में थे, वहीं महीने के अंत तक यह संख्या बढक़र 15 हो गई. महाराष्ट्र का भीमा उज्जैनी बांध और बिहार का चंदन बांध पूरी तरह सूखे रहने की स्थिति में पहुंच चुके हैं. अनेक छोटे जलग्रहण क्षेत्रों में भी पानी का स्तर तेजी से घटा है. यह स्थिति केवल मौजूदा गर्मी का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय से जल संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में बनी कमियों की ओर भी संकेत करती है.
जल संकट का प्रभाव केवल पेयजल तक सीमित नहीं रहता. इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, उद्योगों और ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ता है. देश की कई जल विद्युत परियोजनाएं जलाशयों पर निर्भर हैं. जल स्तर में गिरावट से बिजली उत्पादन प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है. यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो इसका असर खाद्य उत्पादन से लेकर आर्थिक गतिविधियों तक महसूस किया जा सकता है.
हालांकि एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि वर्तमान जल भंडारण पिछले वर्ष की समान अवधि और पिछले दस वर्षों के औसत से कुछ बेहतर है. लेकिन यह राहत स्थायी नहीं मानी जा सकती. जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है. ऐसे में केवल मानसून के भरोसे भविष्य की योजना बनाना पर्याप्त नहीं होगा.
आवश्यकता इस बात की है कि जल संरक्षण को विकास नीति का केंद्रीय विषय बनाया जाए. वर्षा जल संचयन को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन किया जाए, भूजल पुनर्भरण की योजनाओं को गति दी जाए और कृषि क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जाए. शहरी क्षेत्रों में पानी की बर्बादी रोकने तथा जल पुनर्चक्रण की व्यवस्था को भी प्राथमिकता देनी होगी.
जल संकट की यह चेतावनी समय रहते भविष्य की तैयारी करने का अवसर भी है. मानसून राहत दे सकता है, लेकिन स्थायी समाधान केवल सुनियोजित जल प्रबंधन और संरक्षण से ही संभव है. पानी को संसाधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपदा मानकर उसके उपयोग और संरक्षण की संस्कृति विकसित करनी होगी. आज उठाए गए कदम ही आने वाली पीढिय़ों की जल सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे.
