फिलिपींस की राजधानी मनिला में हाल ही में आयोजित बहुपक्षीय बैठकों के दौरान विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की चीन और रूस के विदेश मंत्रियों से मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब वैश्विक राजनीति तेजी से नए समीकरण गढ़ रही है. एक ओर भारत और चीन के बीच व्यापार असंतुलन लगातार बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर रूस एक भारतीय नाविक की मृत्यु के मामले में सवालों के घेरे में है. ऐसे समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की है.
चीन इस समय भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन यह संबंध समानता पर आधारित नहीं है. दोनों देशों के बीच व्यापार में भारी असंतुलन है और भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है. इससे न केवल घरेलू उद्योग प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि आर्थिक निर्भरता भी चिंता का विषय बन रही है. ऐसे में केवल व्यापार बढ़ाने की बजाय संतुलित व्यापार सुनिश्चित करना भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए. जयशंकर द्वारा चीनी विदेश मंत्री के समक्ष यह मुद्दा उठाना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश है कि भारत अब केवल बाजार नहीं, बल्कि बराबरी का आर्थिक साझेदार बनना चाहता है.
दूसरी ओर, रूस के साथ भारत के दशकों पुराने रणनीतिक और रक्षा संबंध हैं. ऊर्जा, रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों देशों के बीच गहरा सहयोग रहा है. किंतु यदि किसी भारतीय नागरिक, विशेषकर नाविक, की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु होती है तो भारत का दायित्व है कि वह पूरी संवेदनशीलता और दृढ़ता के साथ जवाबदेही सुनिश्चित करे. मित्रता का अर्थ यह नहीं कि कठिन प्रश्न पूछे ही न जाएं. बल्कि सच्ची साझेदारी वही होती है जिसमें पारदर्शिता और न्याय के लिए खुलकर संवाद हो.
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत उसकी रणनीतिक स्वायत्तता रही है. आज जब दुनिया अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-पश्चिम टकराव और क्षेत्रीय संघर्षों से जूझ रही है, तब भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की नीति पर चल रहा है. यही कारण है कि भारत एक ओर क्वाड का सक्रिय सदस्य है, तो दूसरी ओर ब्रिक्स, एससीओ और रूस के साथ भी मजबूत संबंध बनाए हुए है. हालांकि, बदलते वैश्विक परिदृश्य में केवल संतुलन बनाए रखना पर्याप्त नहीं होगा. भारत को अपने आर्थिक, सामरिक और मानवीय हितों की रक्षा के लिए अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखनी होगी. चीन के साथ व्यापार हो, रूस के साथ रणनीतिक सहयोग या किसी भी देश के साथ द्विपक्षीय संबंध. राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहने चाहिए.
जयशंकर की हालिया बैठकों का संदेश स्पष्ट है कि भारत अब कूटनीति में विनम्रता और दृढ़ता, दोनों का संतुलित प्रयोग कर रहा है. यही नीति आने वाले वर्षों में भारत की वैश्विक भूमिका को और मजबूत करेगी. मित्रता, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी तभी सार्थक हैं, जब वे परस्पर सम्मान, समान अवसर और नागरिकों की सुरक्षा के सिद्धांतों पर आधारित हों. आज की बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की यही संतुलित, आत्मविश्वासी और हित-केंद्रित विदेश नीति उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर रही है.
