हाल ही में सागर में जहरीली शराब से हुई मौतें एक गंभीर मानवीय त्रासदी हैं. बंडा थाना क्षेत्र के नौरोजा और घुघरा खुर्द गांव में जहरीली शराब के सेवन से अब तक कई लोगों की जान जा चुकी है और बड़ी संख्या में लोग अस्पतालों में उपचार करा रहे हैं. प्रथम दृष्टया शराब में मिथाइल अल्कोहल की मौजूदगी सामने आना इस घटना की भयावहता को और बढ़ाता है. यह केवल अवैध शराब के कारोबार से जुड़ा अपराध नहीं है, बल्कि उन अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है, जिनकी जिम्मेदारी ऐसे कारोबार पर प्रभावी अंकुश लगाने की है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन गांवों में अवैध शराब का कारोबार चल कैसे रहा था ? पुलिस और आबकारी विभाग का मैदानी अमला आखिर क्या कर रहा था ? अवैध शराब की बिक्री कोई ऐसी गतिविधि नहीं है, जो एक-दो दिन में खड़ी हो जाए. इसके लिए शराब की व्यवस्था, उसका परिवहन और स्थानीय स्तर पर बिक्री का पूरा नेटवर्क काम करता है. यदि यह नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय था तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली ? और यदि जानकारी मिली थी तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई ? प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्र की छह शराब दुकानों को सील कर सैंपलिंग के निर्देश दिए हैं. यह तत्काल जांच की दृष्टि से उचित कदम है, लेकिन इससे कहीं अधिक जरूरी है कि संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच हो. केवल अवैध शराब बनाने और बेचने वालों को पकड़ लेना पर्याप्त नहीं होगा. यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि उनकी गतिविधियां अधिकारियों की नजर से कैसे बचती रहीं.यदि जांच में किसी पुलिस या आबकारी अधिकारी की लापरवाही, कर्तव्य के प्रति उदासीनता अथवा अवैध कारोबारियों से मिलीभगत सामने आती है तो उसके खिलाफ कठोर और त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए. ऐसी घटनाओं में केवल तबादला या औपचारिक निलंबन पर्याप्त संदेश नहीं देता. जिम्मेदारी निर्धारित होने के बाद विभागीय कार्रवाई के साथ जरूरत पडऩे पर आपराधिक कार्रवाई भी होनी चाहिए. इससे यह संदेश जाएगा कि जनता की जान से जुड़े मामलों में लापरवाही को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा. मामले में शराब की आपूर्ति उत्तर प्रदेश के ललितपुर से होने की बात सामने आई है. यदि ऐसा है तो जांच को अंतरराज्यीय नेटवर्क तक ले जाना होगा. लेकिन इसके साथ स्थानीय स्तर पर उस नेटवर्क के संपर्कों और संरक्षण की भी पड़ताल जरूरी है. बिना स्थानीय तंत्र की मदद के किसी बाहरी नेटवर्क के लिए गांवों तक जहरीली शराब पहुंचाना आसान नहीं होता. इसलिए जांच केवल सप्लायर और विक्रेता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.फिलहाल सबसे जरूरी है कि प्रभावित गांवों में व्यापक स्क्रीनिंग जारी रहे और संदिग्ध मरीजों को तत्काल उपचार मिले. मृतकों के परिवारों को हरसंभव सहायता और घायलों के उपचार में कोई कमी नहीं होनी चाहिए. साथ ही पुलिस और आबकारी विभाग को पूरे क्षेत्र में अवैध शराब के खिलाफ अभियान चलाना चाहिए.
सागर की घटना ने मैदानी प्रशासन की निगरानी व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है. सरकार ने कठोर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, अब इन निर्देशों को ईमानदारी से लागू करने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की है. जनता को यह भरोसा तभी मिलेगा जब जहरीली शराब बनाने और बेचने वालों के साथ उन अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी, जिनकी लापरवाही के कारण यह कारोबार लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन गया. ऐसी त्रासदी में दोषियों पर त्वरित कार्रवाई ही भविष्य की घटनाओं को रोकने का सबसे प्रभावी संदेश हो सकती है.
