दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत का ढहना महज एक दुर्घटना नहीं है. यह उस भ्रष्ट और लापरवाह व्यवस्था का भयावह परिणाम है, जो हादसा होने के बाद जागती है और कुछ दिनों के शोर के बाद फिर उसी ढर्रे पर लौट जाती है. एक पुरानी इमारत में छात्र हॉस्टल चलता रहा, उसमें बड़ी संख्या में युवा रहते रहे और जिम्मेदार सरकारी एजेंसियां आंखें मूंदे बैठी रहीं. नतीजा सामने है. कई जिंदगियां मलबे में दफन हो गईं और कई परिवारों के सपने हमेशा के लिए उजड़ गए.
सत्य निकेतन जैसे इलाकों में अवैध निर्माण और नियमों की अनदेखी कोई नई बात नहीं है. छात्रों की बढ़ती संख्या को देखते हुए पुराने मकानों को मनमाने ढंग से हॉस्टल और पीजी में बदला जाता है. भवन की संरचनात्मक क्षमता, अग्नि सुरक्षा, आपातकालीन निकास और निर्माण नियमों की परवाह किए बिना अधिक से अधिक लोगों को एक ही इमारत में ठूंस दिया जाता है. कई बार अतिरिक्त निर्माण के लिए बेसमेंट तक में खुदाई कर दी जाती है. लालच में की गई ऐसी खुदाई आसपास की इमारतों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करती है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर अनियमितताएं बिना सरकारी संरक्षण के कैसे चलती रहती हैं. भवन मालिक तो नियम तोड़ता है, लेकिन नियम लागू कराने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की है, उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. किसी इमारत का अवैध निर्माण एक दिन में नहीं होता. वह वर्षों में तैयार होता है. इसके लिए नक्शा पास करने से लेकर निर्माण की निगरानी, निरीक्षण, नोटिस और कार्रवाई तक कई स्तर होते हैं. यदि इन सभी स्तरों पर चूक हुई है तो केवल वर्तमान अधिकारियों पर कार्रवाई करके मामला खत्म नहीं किया जा सकता.
सरकार को इस हादसे की जांच का दायरा तत्काल व्यापक करना चाहिए. वर्तमान अधिकारियों के साथ उन पूर्व अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए, जिनके कार्यकाल में अवैध निर्माण हुआ, जिनके रहते नियमों का उल्लंघन होता रहा और जिन्होंने शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं की. यदि कहीं भ्रष्टाचार, मिलीभगत या जानबूझकर आंखें मूंदने के प्रमाण मिलते हैं तो ऐसे अधिकारियों के खिलाफ भी कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए. सरकारी पद किसी को जवाबदेही से बचने का कवच नहीं बन सकता.
अब समय केवल मुआवजा देने और जांच समिति बनाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का है. देशभर के छात्रावासों, पीजी और विशेष रूप से पुराने भवनों का अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए. इसके लिए एक डिजिटल निगरानी तंत्र बनाया जा सकता है, जिसमें भवन की उम्र, स्वीकृत नक्शा, उपयोग, क्षमता, अग्नि सुरक्षा और संरचनात्मक स्थिति का पूरा रिकॉर्ड हो. एआई और डिजिटल मैपिंग की मदद से स्वीकृत निर्माण और वास्तविक निर्माण के बीच अंतर का पता लगाना भी संभव है.
छात्र केवल किसी परिवार के बच्चे नहीं हैं, वे देश का भविष्य हैं. उनकी सुरक्षा को बाजार और भ्रष्ट तंत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. सत्य निकेतन का हादसा यदि फिर एक आंकड़ा बनकर रह गया तो अगली त्रासदी के लिए जिम्मेदार व्यवस्था आज से ही तैयार होगी. इसलिए दोषी मालिकों के साथ भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारियों पर भी शीघ्र, निष्पक्ष और कठोरतम कार्रवाई जरूरी है. यही मृतकों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और भविष्य के छात्रों के प्रति सरकार की वास्तविक जिम्मेदारी होगी.
