सडक़ हादसे : अब निर्णायक कार्रवाई का समय

मध्य प्रदेश विधानसभा में प्रस्तुत सडक़ दुर्घटनाओं के आंकड़े केवल सरकारी रिकॉर्ड नहीं हैं, बल्कि हजारों परिवारों के उजडऩे की दर्दनाक कहानी भी हैं. जनवरी 2025 से 7 जुलाई 2026 तक प्रदेश में 90,138 सडक़ दुर्घटनाएं हुईं. इनमें 25,869 लोगों की मृत्यु हुई और 95,843 लोग घायल हुए. इसका अर्थ है कि औसतन प्रतिदिन 474 सडक़ हादसे हुए और लगभग 136 लोगों ने अपनी जान गंवाई. यह स्थिति किसी भी संवेदनशील समाज और सरकार के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

सडक़ दुर्घटनाओं को अक्सर केवल मानवीय भूल मान लिया जाता है, जबकि इसके पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं. खराब सडक़ इंजीनियरिंग, ब्लैक स्पॉट, तेज रफ्तार, ओवरलोडिंग, शराब पीकर वाहन चलाना, हेलमेट और सीट बेल्ट के नियमों की अनदेखी, अपर्याप्त ट्रैफिक प्रबंधन तथा समय पर चिकित्सा सहायता का अभाव. ये सभी मिलकर दुर्घटनाओं को जानलेवा बना देते हैं. यदि इन कारणों पर समग्र रूप से काम नहीं किया गया तो केवल जागरूकता अभियान चलाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इंदौर में सबसे अधिक सडक़ दुर्घटनाएं हुई हैं. यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि यहां वाहनों का दबाव सबसे अधिक है. वहीं भिंड में सर्वाधिक मौतें होना यह संकेत देता है कि केवल दुर्घटनाओं की संख्या ही नहीं, बल्कि दुर्घटना के बाद मिलने वाली चिकित्सा सुविधा और सडक़ सुरक्षा मानकों का स्तर भी अलग-अलग जिलों में गंभीर समीक्षा की मांग करता है.

सबसे चिंताजनक तथ्य ‘राहवीर योजना’ का सीमित प्रभाव है. सडक़ दुर्घटना में घायल व्यक्ति को ‘गोल्डन ऑवर’ के भीतर अस्पताल पहुंचाना जीवन और मृत्यु के बीच का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है. इसके बावजूद योजना लागू होने के बाद पूरे प्रदेश में केवल 49 लोगों को सम्मानित किया गया. यह संख्या बताती है कि या तो लोगों को योजना की जानकारी नहीं है अथवा प्रशासन इसका पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं कर पाया. यदि नागरिकों को कानूनी सुरक्षा और प्रोत्साहन की जानकारी मिले तो अनेक लोगों की जान बचाई जा सकती है.अब आवश्यकता केवल चिंता व्यक्त करने की नहीं, बल्कि ठोस सुधारों की है. सबसे पहले प्रदेश के सभी दुर्घटना-प्रवण ब्लैक स्पॉट का वैज्ञानिक सर्वे कर उन्हें प्राथमिकता के आधार पर सुधारा जाए. राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर आधुनिक संकेतक, पर्याप्त रोशनी, सुरक्षित डिवाइडर और पैदल यात्रियों के लिए सुविधाएं विकसित की जाएं. यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों पर तकनीक आधारित सख्त निगरानी हो तथा हेलमेट और सीट बेल्ट के नियमों का बिना किसी भेदभाव के पालन कराया जाए.इसके साथ ही हर जिला अस्पताल और प्रमुख मार्गों पर अत्याधुनिक ट्रॉमा सेंटर तथा पर्याप्त एंबुलेंस नेटवर्क विकसित करना समय की आवश्यकता है. स्कूलों, कॉलेजों और ड्राइविंग लाइसेंस प्रक्रिया में सडक़ सुरक्षा शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए. भारी वाहनों के चालकों के नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और प्रशिक्षण की व्यवस्था भी दुर्घटनाओं में कमी ला सकती है.

मध्य प्रदेश तेजी से विकसित हो रहा है. बेहतर सडक़ें विकास का प्रतीक हैं, लेकिन यदि वही सडक़ें लोगों की जान लेने लगें तो विकास का उद्देश्य अधूरा रह जाता है. सडक़ सुरक्षा को केवल परिवहन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सरकार, प्रशासन, पुलिस और नागरिक समाज की साझा जिम्मेदारी बनाना होगा. आंकड़ों पर चर्चा से अधिक महत्वपूर्ण है कि उन पर समयबद्ध कार्रवाई हो. हर बची हुई जान ही किसी भी सडक़ सुरक्षा नीति की सबसे बड़ी सफलता होगी.

 

 

 

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