मध्य प्रदेश विधानसभा द्वारा समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) विधेयक, 2026 का पारित होना केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि समान न्याय और समान नागरिक अधिकारों की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है. उत्तराखंड, असम और गोवा के बाद मध्य प्रदेश इस दिशा में आगे बढऩे वाला देश का चौथा राज्य बन गया है. यह निर्णय लंबे समय से चल रही उस संवैधानिक सोच को आगे बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून की व्यवस्था सुनिश्चित करना है.
भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 स्पष्ट रूप से राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने का निर्देश देता है. यद्यपि नीति-निर्देशक तत्व न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन वे शासन की दिशा और लोकतांत्रिक मूल्यों के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं. संविधान निर्माताओं की यह मंशा थी कि समय के साथ देश ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़े, जहां नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकार धर्म के आधार पर अलग-अलग न होकर समान संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित हों.
मध्य प्रदेश के यूसीसी विधेयक में कई ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जो सामाजिक न्याय और पारदर्शिता को मजबूत करते हैं. बहुविवाह, तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक, विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण, लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण तथा महिलाओं और बच्चों को उत्तराधिकार एवं गोद लेने के मामलों में समान अधिकार देना समाज में समानता की भावना को सुदृढ़ करेगा. साथ ही, अनुसूचित जनजातियों को इस कानून के दायरे से बाहर रखकर उनकी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान भी किया गया है, जो संवैधानिक भावना के अनुरूप है.
निस्संदेह, यूसीसी जैसे विषय पर अलग-अलग मत हो सकते हैं. लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए और कानून के विभिन्न पहलुओं पर रचनात्मक चर्चा भी आवश्यक है. यदि किसी प्रावधान को लेकर व्यावहारिक या कानूनी चिंताएं हैं, तो उन्हें संवैधानिक और लोकतांत्रिक मंचों पर रखा जाना चाहिए. लेकिन इस विषय को केवल वोट बैंक की राजनीति का माध्यम बनाना न तो समाज के हित में है और न ही संविधान की भावना के अनुरूप.
देश को यह समझना होगा कि समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य किसी धर्म विशेष को लक्ष्य बनाना नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान दायित्व सुनिश्चित करना है. यदि महिलाओं, बच्चों और परिवार संस्था को अधिक कानूनी सुरक्षा मिलती है तथा नागरिक अधिकारों में समानता आती है, तो इसे सामाजिक सुधार की दिशा में सकारात्मक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए. प्रदेश का यह निर्णय आने वाले समय में राष्ट्रीय विमर्श को नई दिशा देगा. अब आवश्यकता इस बात की है कि इस कानून के क्रियान्वयन में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और व्यापक जनजागरूकता सुनिश्चित की जाए. साथ ही, सभी पक्षों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर संविधान की मूल भावना,समानता, न्याय और नागरिक अधिकारों,को केंद्र में रखकर विचार करना चाहिए. यही लोकतंत्र की परिपक्वता और भारत की संवैधानिक प्रतिबद्धता का वास्तविक परिचायक होगा.
