रेल से बदलेगी आदिवासी अंचल की तस्वीर

18 साल सात महीने का इंतजार मंगलवार को उस ऐतिहासिक क्षण के साथ खत्म हुआ, जब धार की धरती पर पहली बार यात्री रेल की सीटी गूंजी. आदिवासी अंचल के लिए यह केवल रेल सेवा की शुरुआत नहीं, बल्कि विकास की मुख्यधारा से जुडऩे की दिशा में एक बड़ा कदम है. वर्षों से रेल की प्रतीक्षा कर रहे धार-आलीराजपुर और आसपास के लोगों के लिए यह किसी बड़ी सौगात से कम नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वडोदरा से आभासी माध्यम से प्रतापनगर-टांडा रोड 12 कोच की मेमू ट्रेन को हरी झंडी दिखाई तो टांडा रोड स्टेशन पर उत्सव का माहौल बन गया. पटरियों पर दौड़ी पहली यात्री रेल के साथ एक लंबे सपने ने हकीकत का रूप लिया.

इस उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बड़ा है कि जिस परियोजना की नींव वर्ष 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने रखी थी, उसका महत्वपूर्ण हिस्सा करीब दो दशक बाद यात्री सेवा के लिए तैयार हो पाया है. टांडा रोड तक रेल पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन अभी यह सफर पूरा नहीं हुआ है. टांडा रोड से धार तक करीब 47 किलोमीटर रेलखंड का काम शेष है. इसे दिसंबर 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है. जरूरत इस बात की है कि काम की गति बढ़ाई जाए और संभव हो तो तय समय से पहले धार तक रेल पहुंचाई जाए. बहरहाल,आलीराजपुर, जोबट और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों के लिए गुजरात के व्यापारिक केंद्रों तक पहुंच अब आसान होगी. श्रमिकों के साथ विद्यार्थियों, मरीजों, व्यापारियों और रोजगार की तलाश में जाने वाले युवाओं को सस्ता और सुविधाजनक परिवहन मिलेगा.दरअसल,रेल जहां पहुंचती है, वहां केवल यातायात नहीं बढ़ता, बल्कि बाजार, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और निवेश के नए अवसर भी खुलते हैं. इसलिए इस रेल परियोजना को केवल परिवहन सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि आदिवासी अंचल के आर्थिक और सामाजिक बदलाव के माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए.इस परियोजना से एक बड़ा सबक यह भी मिलता है कि रेल जैसी अधोसंरचना परियोजनाओं में देरी की कीमत बहुत अधिक होती है. वर्षों तक निर्माण लंबित रहने से लोगों को सुविधा का इंतजार करना पड़ता है और भूमि, सामग्री तथा निर्माण लागत बढऩे से सरकारी खजाने पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ता है. इसलिए मध्यप्रदेश की अन्य रेल परियोजनाओं को भी इसी दृष्टि से गति देना जरूरी है.मालवा-निमाड़ में इंदौर-दाहोद रेल परियोजना के साथ इंदौर-मनमाड़ रेल लाइन पर भी काम चल रहा है. इनकी धीमी गति चिंता का विषय है. खास तौर पर महू-सनावद खंड को प्राथमिकता से पूरा किया जाना चाहिए. इससे इंदौर की पूर्वी निमाड़ से कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार, पर्यटन तथा औद्योगिक गतिविधियों को गति मिलेगी. इंदौर-दाहोद परियोजना पूरी होने पर पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल को गुजरात और देश के अन्य हिस्सों से बेहतर रेल संपर्क मिलेगा. धार की धरती पर पहुंची पहली रेल उम्मीद की नई किरण है. आशा की जानी चाहिए कि यह रेल केवल पटरियों पर नहीं दौड़ेगी, बल्कि आदिवासी अंचल में विकास, रोजगार और आर्थिक अवसरों का पहिया भी तेजी से घुमाएगी. अब जरूरत है कि इस शुरुआत को शेष परियोजनाओं की तेज रफ्तार से नई ताकत दी जाए.

 

 

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