नई दिल्ली, 23 जून (वार्ता) भारत के पारेषण क्षेत्र की शीर्ष संस्था इलेक्ट्रिक पावर ट्रांसमिशन एसोसिएशन (ईपीटीए) ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह अंतर्राज्यीय पारेषण प्रणाली (आईएसटीएस) छूट को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की योजना पर पुनर्विचार करे।
ईपीटीए ने सुझाव दिया है कि देश के 2030 तक 500 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा लक्ष्य को देखते हुए सरकार को ज़मीन पर प्रगति कर रहे प्रोजेक्ट्स को राहत देने के लिए माइलस्टोन आधारित मोहलत प्रणाली अपनानी चाहिए।
ईपीटीए के महानिदेशक जीपी उपाध्याय ने कहा, “हम सरकार से पूरी छूट की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि सिर्फ़ यह कह रहे हैं कि जिन परियोजनाओं ने वित्तीय क्लोजर, जमीन अधिग्रहण और उपकरणों की खरीद जैसे अहम पड़ाव पार कर लिए हैं। उन्हें छह से नौ महीने की अतिरिक्त मोहलत दी जानी चाहिए ताकि वे आईएसटीएस छूट का लाभ ले सकें।”
ईपीटीए का यह भी कहना है कि यदि छूट पूरी तरह वापस लेनी हो तो उसे प्रस्तावित 25 प्रस्तावित की वार्षिक कटौती की जगह 10 प्रतिशत की दर से धीरे-धीरे हटाया जाए, जिससे अक्षय ऊर्जा की लागत पर अचानक बोझ न पड़े। इससे ग्रीन एनर्जी को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना और निवेश आकर्षित करना आसान होगा।
वर्ष 2016 में शुरू की गई आईएसटीएस पारेषण चार्ज छूट नीति ने भारत के हरित ऊर्जा संक्रमण को गति दी है। यह नीति अब 01 जुलाई 2025 से चरणबद्ध तरीके से समाप्त होने जा रही है। उद्योग जगत का मानना है कि इससे चालू परियोजनओं की व्यवहार्यता पर असर पड़ सकता है और निवेश अस्थिर हो सकता है।
ईपीटीए ने याद दिलाया कि हाल ही में पंप हाइड्रो और बैटरी स्टोरेज परियोजना को जून 2028 तक छूट देने का निर्णय लिया गया, जो माइलस्टोन आधारित ढांचे की स्वीकार्यता को दर्शाता है। ऐसे में, ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स को भी वही व्यावहारिक समर्थन मिलना चाहिए।ईपीटीए ने यह भी रेखांकित किया कि अगले 8-10 वर्षों में पारेषण क्षेत्र में 100 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की आवश्यकता होगी। इस निवेश से भारत की हरित ऊर्जा इकोसिस्टम की रीढ़ मानी जा रही ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूती मिलेगी।
