ऋचा चड्ढा ने दिलाई 80 के दशक के सिनेमा की याद, बोलीं- इंडिपेंडेंट फिल्मों को बड़े चेहरों नहीं

ऋचा चड्ढा ने इंडिपेंडेंट फिल्मों में कमर्शियल एक्टर्स की कास्टिंग पर सवाल उठाए हैं। ऋचा चड्ढा का कहना है कि हर कहानी को बड़े स्टार्स की जरूरत नहीं होती।

बॉलीवुड अभिनेत्री और प्रोड्यूसर ऋचा चड्ढा एक बार फिर अपने बेबाक बयान को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने इंडिपेंडेंट सिनेमा और ‘कमर्शियल एक्टर्स’ को लेकर खुलकर अपनी राय रखी है, जिससे फिल्म इंडस्ट्री में नई बहस छिड़ गई है। ऋचा चड्ढा ने इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर्स द्वारा बड़े और कमर्शियल एक्टर्स को कास्ट करने के ट्रेंड पर सवाल खड़े किए।

ऋचा चड्ढा ने कहा कि अगर कोई एक्टर फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर ओपनिंग नहीं दिला सकता और न ही फिल्म फेस्टिवल्स में कोई खास पहचान दिलाता है, तो ऐसे एक्टर्स को इंडी फिल्मों में कास्ट करने का क्या फायदा। उनका मानना है कि इंडिपेंडेंट फिल्मों को उनकी कहानी और परफॉर्मेंस के दम पर पहचान मिलनी चाहिए, न कि बड़े नामों के सहारे।

कहानियों को नहीं चाहिए बड़े चेहरे
ऋचा ने साफ कहा कि हर कहानी को बड़े स्टार्स की जरूरत नहीं होती। कई बार कम बजट में काम करने वाले और टैलेंटेड एक्टर्स फिल्म को ज्यादा विश्वसनीय और प्रभावशाली बना सकते हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ट्रेंड और काबिल एक्टर्स के साथ काम करने से फिल्म की क्वालिटी बरकरार रहती है, जबकि बड़े स्टार्स के साथ बजट भी बढ़ जाता है।

इंडी सिनेमा की असली पहचान पर जोर
एक्ट्रेस ने इंडिपेंडेंट सिनेमा की जड़ों की बात करते हुए कहा कि इसका असली मकसद नई प्रतिभाओं को सामने लाना है चाहे वो एक्टर्स हों, लेखक हों या टेक्नीशियन। उन्होंने कहा कि जब फिल्ममेकर्स ‘कमर्शियल वैल्यू’ के नाम पर कास्टिंग में समझौता करते हैं, तो फिल्म अपनी असल आत्मा खो देती है। ऋचा चड्ढा ने 1980 के दशक के इंडी सिनेमा को याद करते हुए फारूक शेख, अमोल पालेकर और शबाना आजमी जैसे कलाकारों का उदाहरण दिया।

इंडस्ट्री के लिए दिया चेतावनी
ऋचा चड्ढा ने कहा कि उस दौर में ये कलाकार खुद में बड़े नाम थे और कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों को नई ऊंचाइयों तक ले गए थे, लेकिन आज वैसा माहौल कहीं खो गया है। ऋचा ने यह भी कहा कि अगर इंडस्ट्री सिर्फ कुछ बड़े मेल एक्टर्स पर ही निर्भर रहती रही, तो फिल्मों का निर्माण कम हो सकता है। उन्होंने इशारों-इशारों में कहा कि ऐसे एक्टर्स पहले से ही व्यस्त और थके हुए हैं, जिन पर हर फिल्म का भार डालना सही नहीं है।

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