स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा केवल उनके माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज और प्रशासन की सामूहिक जवाबदेही है. दुर्भाग्य से आज भी शहरों और कस्बों में स्कूल रिक्शा, ऑटो और वैन में क्षमता से कई गुना अधिक बच्चों को बैठाकर उनकी जान जोखिम में डाली जा रही है. यह स्थिति केवल नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं, बल्कि मासूम बच्चों के जीवन के साथ खुला खिलवाड़ है.
हर वर्ष स्कूल खुलने के साथ प्रशासन अभियान चलाने, जांच करने और नियमों के पालन के बड़े-बड़े दावे करता है. कुछ दिनों तक चालान काटे जाते हैं, चेतावनी दी जाती है, लेकिन समय बीतते ही पूरा अभियान ठंडे बस्ते में चला जाता है. नतीजा यह होता है कि ओवरलोड वाहन फिर से सडक़ों पर दौडऩे लगते हैं. तस्वीरें और वीडियो बार-बार यही साबित करते हैं कि व्यवस्था की निगरानी कमजोर है और नियमों का भय लगभग समाप्त हो चुका है.
एक छोटे से ऑटो में आठ-दस बच्चों को ठूंस देना, वैन में निर्धारित क्षमता से कहीं अधिक विद्यार्थियों को बैठाना और कई बार दरवाजे खुले रखकर वाहन चलाना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता. दुर्घटना होने पर सबसे पहले यही प्रश्न उठता है कि प्रशासन पहले क्यों नहीं जागा. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न राज्यों ने स्कूल वाहनों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए हैं. वाहन की फिटनेस, चालक का सत्यापन, निर्धारित क्षमता, अग्निशमन यंत्र, प्राथमिक उपचार किट और सुरक्षा मानकों का पालन अनिवार्य किया गया है. इसके बावजूद इन नियमों का पालन कागजों तक ही सीमित दिखाई देता है. जब तक नियमित और सख्त निगरानी नहीं होगी, तब तक नियमों का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाएगा.
इस समस्या का एक आर्थिक पक्ष भी है. कई अभिभावक कम शुल्क के कारण ऐसे वाहनों का चयन कर लेते हैं, जबकि कुछ वाहन चालक अधिक कमाई के लालच में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाते हैं. स्कूल प्रबंधन भी कई बार परिवहन व्यवस्था की प्रभावी निगरानी नहीं करता. परिणामस्वरूप बच्चों की सुरक्षा सबसे कमजोर कड़ी बन जाती है.
जरूरत इस बात की है कि प्रशासन केवल औपचारिक कार्रवाई तक सीमित न रहे. स्कूल खुलने के शुरुआती दिनों के बजाय पूरे वर्ष नियमित जांच अभियान चलाए जाएं. नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों के लाइसेंस निलंबित किए जाएं, वाहनों का पंजीयन रद्द किया जाए और बार-बार गलती करने वालों पर कठोर दंड लगाया जाए. साथ ही स्कूल प्रबंधन की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए.
अभिभावकों को भी अपनी भूमिका समझनी होगी. यदि कोई वाहन क्षमता से अधिक बच्चों को लेकर जा रहा है तो केवल सुविधा या कम खर्च के कारण उसे स्वीकार करना उचित नहीं है. बच्चों की सुरक्षा किसी भी आर्थिक बचत से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.
किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों की कितनी सुरक्षा करता है. यदि हम अपने नौनिहालों को सुरक्षित स्कूल तक पहुंचाने की व्यवस्था भी सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो विकास के बड़े-बड़े दावों का कोई अर्थ नहीं रह जाता. प्रशासन, स्कूल, वाहन संचालक और अभिभावक सभी को मिलकर यह संकल्प लेना होगा कि बच्चों की सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होगा. क्योंकि एक छोटी-सी लापरवाही जीवनभर का बड़ा पछतावा बन सकती है.
