स्वाधीनता का अर्थ केवल पराधीनता की बेडिय़ों से मुक्ति नहीं होता. स्वाधीनता उस चेतना का नाम है, जिसमें व्यक्ति को प्रश्न पूछने, विचार रखने, अपनी राह चुनने और सत्ता से असहमति व्यक्त करने का अधिकार प्राप्त हो. इसलिए स्वाधीनता दिवस केवल अतीत की उस ऐतिहासिक विजय का उत्सव नहीं है, जिसने भारत को विदेशी शासन से मुक्त कराया, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक चेतना के उत्सव का अवसर भी है, जिसने विविधताओं से भरे इस देश को एक सूत्र में बांधे रखा है.
आजादी के 80 वें वर्ष में जब हम विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं, तब यह विचार करना स्वाभाविक है कि हमारी लोकतांत्रिक शक्ति का वास्तविक आधार क्या है. क्या वह सभी का एक जैसा सोचना है ? निश्चित रूप से नहीं. भारत की शक्ति तो इस बात में रही है कि यहां अनेक विचार, अनेक मत, अनेक भाषाएं, अनेक आस्थाएं और अनेक जीवन-दृष्टियां साथ-साथ अस्तित्व में रही हैं. हमारे लोकतंत्र की सुंदरता एकरूपता में नहीं, बल्कि विविध स्वरों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता में है.
इसी संदर्भ में असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी जीवनधारा है. असहमति प्रश्न खड़े करती है, सत्ता को आईना दिखाती है और समाज को जड़ होने से बचाती है. स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास स्वयं इसका प्रमाण है. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर, डॉ. आंबेडकर और भगत सिंह के विचारों और संघर्ष की पद्धतियों में गहरे अंतर थे, लेकिन इन मतभेदों ने भारत की स्वतंत्रता की आकांक्षा को कमजोर नहीं किया. अलग-अलग विचारों ने ही स्वतंत्र भारत की वैचारिक जमीन को व्यापक बनाया.दरअसल,असहमति की गरिमा तभी तक सुरक्षित रहती है, जब तक उसके साथ संवाद का संस्कार जीवित रहता है. संवाद का अर्थ केवल अपनी बात कहना नहीं, दूसरे की बात सुनने का धैर्य रखना भी है. जब संवाद समाप्त होता है, तब असहमति अविश्वास में और अविश्वास टकराव में बदलने लगता है. आज के डिजिटल दौर में यह चुनौती और गंभीर है. सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति के अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन साथ ही समाज को वैचारिक खांचों में बांटने का खतरा भी पैदा किया है. ऐसे समय में दूसरे मत को सुनना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है.
हाल के युवा और छात्र आंदोलनों को भी इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है. युवाओं का प्रश्न पूछना और व्यवस्था से असहमति जताना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है. लेकिन सरकार और व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बनने वाली परिस्थितियों का समाधान भी केवल संवाद से ही संभव है. सरकारों को यह स्मरण रखना चाहिए कि चुने हुए प्रतिनिधि लोक से शक्ति प्राप्त करते हैं और लोक की आवाज सुनना उनकी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है. दूसरी ओर आंदोलनकारी युवाओं को भी यह समझना होगा कि अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व जुड़ा होता है. आंदोलन की ताकत उसकी शांति, संयम और नैतिक ऊंचाई में होती है.वर्ष 2047 का विकसित भारत केवल मजबूत अर्थव्यवस्था, आधुनिक बुनियादी ढांचे और तकनीकी प्रगति से परिभाषित नहीं होगा. वास्तविक विकसित भारत वह होगा, जहां नागरिक विचारों की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी का बोध भी रखें, जहां सत्ता असहमति को सुने और समाज असहमति को सहने का संस्कार विकसित करे.
इस स्वाधीनता दिवस पर इसलिए केवल तिरंगे को सलाम करना पर्याप्त नहीं. हमें उस लोकतांत्रिक मूल्य-व्यवस्था को भी प्रणाम करना होगा, जिसने हमें अलग होकर भी साथ रहने की शक्ति दी है. आइए, आजादी को अधिकार के साथ जिम्मेदारी, असहमति को विरोध के साथ विमर्श और संवाद को केवल शब्दों के आदान-प्रदान के बजाय लोकतंत्र की जीवन-पद्धति बनाने का संकल्प लें.
क्योंकि आजादी हमें स्वर देती है, असहमति लोकतंत्र को जीवंत रखती है और संवाद उन स्वरों को राष्ट्र की सामूहिक शक्ति में बदलता है.
