संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से विदेश मंत्री एस. जयशंकर का आतंकवाद और उसे संरक्षण देने वाले देशों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का आह्वान केवल पाकिस्तान को दिया गया संदेश नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक दोहरेपन पर भी सवाल है, जिसके कारण आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई दशकों से अधूरी बनी हुई है. भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि आतंकवाद को किसी राजनीतिक, धार्मिक या रणनीतिक तर्क के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता. अब आवश्यकता इस बात की है कि इस सिद्धांत को वैश्विक नीति में भी बदला जाए.
जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद को पनाह देने वालों को कठघरे में लाने का समय आ गया है. सरहद पार आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले देशों के खिलाफ दुनिया को एकजुट होना होगा और आर्थिक कार्रवाई भी की जानी चाहिए. यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आतंकवाद केवल बंदूक और बारूद से नहीं चलता. उसे धन, प्रशिक्षण, हथियार, सुरक्षित ठिकाने और राजनीतिक संरक्षण की जरूरत होती है. जब तक इस पूरे तंत्र पर एक साथ प्रहार नहीं होगा, तब तक आतंकवाद के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बावजूद स्थायी समाधान कठिन रहेगा.
पाकिस्तान का कश्मीर राग भी संयुक्त राष्ट्र के मंच पर एक बार फिर सुनाई दिया. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कश्मीर को लेकर वही पुराना रुख दोहराया और जनमत संग्रह की बात की. भारत ने इसके जवाब में पाकिस्तान को पहले अपने कब्जे वाले कश्मीर की स्थिति देखने की सलाह दी. यह बहस अब केवल दावों और आरोपों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में लोगों की राजनीतिक और आर्थिक आकांक्षाओं, नागरिक सुविधाओं और अधिकारों से जुड़े सवाल भी अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनने चाहिए. कश्मीर का उल्लेख करने से पहले पाकिस्तान को अपने भीतर उठ रहे असंतोष और वहां के नागरिकों की स्थिति पर भी जवाब देना होगा.सिंधु जल संधि और पानी को लेकर पाकिस्तान की चेतावनी भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू है. पानी जैसे जीवन और अर्थव्यवस्था से जुड़े संसाधन को युद्ध की कार्रवाई से जोडऩा क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकता है. भारत को अपने राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के बीच संतुलन रखते हुए इस विषय पर स्पष्ट और तथ्याधारित रुख बनाए रखना होगा. साथ ही पाकिस्तान को भी यह समझना होगा कि आतंकवाद और द्विपक्षीय संबंधों को अलग-अलग खानों में रखकर आगे बढऩे की नीति लंबे समय तक नहीं चल सकती.इसी बीच रूस द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन भारत की वैश्विक भूमिका की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है. सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना आज की वैश्विक वास्तविकताओं का पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करती. दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और महत्वपूर्ण विकासशील देशों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित स्थान मिलना चाहिए. भारत की स्थायी सदस्यता का प्रश्न इसी व्यापक सुधार का हिस्सा है.संयुक्त राष्ट्र का मंच एक बार फिर यह संदेश दे रहा है कि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था को पुराने समीकरणों से आगे बढऩा होगा. आतंकवाद पर चयनात्मक दृष्टिकोण, क्षेत्रीय विवादों पर दोहरा मापदंड और सुरक्षा संस्थाओं की असंतुलित संरचना दुनिया की समस्याओं को हल नहीं कर सकती. भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई को वैश्विक सहयोग से जोड़ते हुए सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग को भी मजबूती से आगे बढ़ाना चाहिए. आतंकवाद को पालने वालों पर कार्रवाई और वैश्विक संस्थाओं में न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व, दोनों आज समय की जरूरत हैं.
