बस्तर के जंगलों में बीते चौबीस घंटे केवल एक मुठभेड़ की खबर नहीं हैं. यह भारत की आंतरिक सुरक्षा इतिहास का एक निर्णायक मोड़ है. एक दशक से अधिक समय तक बस्तर को रक्तरंजित करने वाला, 1.8 करोड़ रुपये के इनाम का खूंखार माओवादी कमांडर मांडवी हिडिमा अंतत: ढेर कर दिया गया है. आंध्र प्रदेश,छत्तीसगढ़ सीमा के सघन जंगलों में हुई इस मुठभेड़ ने न केवल सुरक्षा बलों की अदम्य क्षमता का प्रमाण दिया है, बल्कि इसने यह भी संकेत दिया है कि नक्सलवाद के अंत की आहट अब साफ-साफ सुनाई देने लगी है.
मांडवी हिडिमा कोई साधारण माओवादी नहीं था. वह सीपीआई (माओवादी) की पीएलजीए बटालियन नंबर 1 का प्रमुख और संगठन की सेंट्रल कमेटी का अहम सदस्य था. उसकी पकड़ इतनी व्यापक थी कि बस्तर के दूर-दराज इलाकों में उसका नाम ही दहशत फैलाने के लिए काफी था. ग्रामीणों की हत्या से लेकर सुरक्षाबलों पर घातक हमले,हिडिमा का रिकॉर्ड लाल आतंक की पूरी कहानी समेटे हुए था. उनके नेतृत्व में माओवादियों द्वारा किया गया
25 मई 2013 का झीरम घाटी नरसंहार भारतीय लोकतंत्र पर सबसे भयंकर हमलों में से एक था. कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के काफिले पर हुए इस सुनियोजित हमले में नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, विद्या चरण शुक्ल और 29 से अधिक लोगों की हत्या ने पूरे देश को हिला दिया था. यह हमला केवल राजनीतिक प्रतिशोध नहीं था. यह लोकतांत्रिक ढांचे को भयभीत करने का प्रयास था. उस काले दिन का मुख्य साजिशकर्ता हिडिमा था. जाहिर है वही खूनी हाथ हमेशा के लिए शांत हो चुके हैं. बस्तर के सामाजिक मानस में यह अंत न्याय के रूप में दर्ज होगा.बहरहाल, मुठभेड़ की तीव्रता इस बात का प्रमाण है कि माओवादी नेतृत्व इस क्षेत्र में पुनर्गठन की आखिरी कोशिश में था. परन्तु सुरक्षा बलों की खुफिया रणनीति, स्थानीय जागरूकता और आधुनिक तकनीकी सहायता ने इसे विफल कर दिया. यह ऑपरेशन साबित करता है कि बस्तर अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है जहां राज्य की इच्छा, सुरक्षाबलों की सटीकता और जनता का समर्थन एक साथ खड़े हैं. हिडिमा की मौत को माओवादी आंदोलन के पिछले बीस वर्षों का सबसे बड़ा नुकसान माना जा रहा है.यह ध्यान रहे हिडिमा रणनीति, भर्ती और प्रशिक्षण, सभी क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता था.उसका जाना माओवादी नेतृत्व की रीढ़ तोड़ देगा. जमीनी स्तर पर पहले ही सरेंडर की संख्या बढ़ रही है. अब यह प्रक्रिया और तेज होने की संभावना है. दरअसल,दक्षिण बस्तर के जिन क्षेत्रों को हिडिमा दुर्गम किलों की तरह इस्तेमाल करता था, वे अब धीरे-धीरे सुरक्षा बलों के नियंत्रण में लौटेंगे. इसके बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या नक्सलवाद अब खत्म हो जाएगा ? जवाब यह है कि यह अंत की शुरुआत ज़रूर है. नक्सलवाद अपनी वैचारिक जमीन खो चुका है. आम आदिवासी अब विकास, सडक़, शिक्षा, मोबाइल नेटवर्क और रोज़ रोजगार चाहते हैं. इन मांगों को सुनने वाली सरकार उनके साथ खड़ी है. दूसरी तरफ माओवादी संगठन अपने सबसे प्रभावी कमांडरों को खो चुका है, जबकि नई पीढ़ी इस हिंसक विचारधारा में रुचि नहीं ले रही.
मांडवी हिडिमा का अंत केवल एक ऑपरेशन की सफलता नहीं, बल्कि बस्तर की नई सुबह का उद्घोष है. यह उस बस्तर की उम्मीद को मजबूत करता है जो दशकों से लाल आतंक की छाया में घुटता रहा है. आज यह साफ दिखाई दे रहा है कि क्रूरता की उम्र लंबी नहीं होती और बंदूक की भाषा अंतत: पराजित होती है.
अगर यही रफ्तार बनी रही तो आने वाले दिनों में भारत वह ऐतिहासिक घोषणा कर सकेगा कि नक्सलवाद अब अतीत है !
