खंडवा जिला मध्य प्रदेश का वह इलाका रहा है जो अपनी भौगोलिक स्थिति और सामाजिक बनावट के कारण हमेशा से सुरक्षा एजेंसियों की दृष्टि में संवेदनशील रहा है. नर्मदा और सतपुड़ा के बीच बसा यह क्षेत्र कभी सीधा-सादा प्रशासनिक केंद्र माना जाता था, लेकिन बीते दो दशकों में यहां की छवि कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा बहसों का हिस्सा रही है. अब हाल ही में बरामद हुए नकली नोटों के बड़े जखीरे और मदरसे से इमाम की गिरफ्तारी ने एक बार फिर उस पुराने इतिहास को ताजा कर दिया है. अतीत में खंडवा को स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का महत्त्वपूर्ण गढ़ माना जाता रहा है. संगठन के कई प्रमुख सदस्य इसी क्षेत्र से जुड़े रहे, और 2013 के आसपास सिमी से जुड़े कई आरोपियों की खंडवा जेल से भागने की घटना ने पूरे देश में चिंता की लहर पैदा की थी. इसके बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी और राज्य की एटीएस ने यहां लंबे समय तक कार्रवाई की. खंडवा का नाम तब से राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में बार-बार सुना जाने लगा. इसी पृष्ठभूमि में जब नकली नोटों की बड़ी बरामदगी की खबर सामने आई, तो यह केवल आर्थिक अपराध का मामला नहीं लग रहा. फेक इंडियन करेंसी नोट्स के जरिए आतंकवादी संगठन अक्सर अपने नेटवर्क की फंडिंग करते रहे हैं. यह भी संभव है कि नकली नोटों का यह रैकेट किसी व्यापक साजिश का हिस्सा हो, जिसके तंतु सीमा पार तक फैले हों. इस मामले में जिस इमाम की गिरफ्तारी हुई है, उसकी भूमिका और सम्पर्कों की गहराई से जांच जरूरी है. यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल अवैध मुद्रा का धंधा है, या फिर इसके पीछे किसी पुनरुत्थानशील नेटवर्क की चाल है. आतंकवाद के नए चेहरे अब धार्मिक, सामाजिक या आर्थिक गतिविधियों की आड़ में अपने निशान मिटाने में निपुण हैं. अत: यह जांच सतही न होकर बहु-आयामी दृष्टिकोण से की जानी चाहिए. राज्य और केंद्र की खुफिया एजेंसियों के पास इस क्षेत्र का लंबा रिकॉर्ड है. उन्हें यह परखना होगा कि कहीं पुराने निष्क्रिय नेटवर्क फिर से सक्रिय तो नहीं हो रहे. मध्य प्रदेश भले ही पिछले वर्षों में आतंकी घटनाओं से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा हो, लेकिन खंडवा और आसपास के इलाकों में गतिविधियों का पुनर्जीवन पूरे क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है. इस संदर्भ में स्थानीय पुलिस, खुफिया विभाग, और केंद्रीय एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय अनिवार्य है. जांच केवल गिरफ्तारी या बरामदगी पर सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसके वित्तीय स्रोतों, सम्पर्क श्रृंखलाओं और संभावित विदेशी कडिय़ों का विश्लेषण किया जाना चाहिए. डिजिटल व्यवहार, बैंकिंग नेटवर्क और आपराधिक सर्विलांस जैसी आधुनिक तकनीकों का समुचित उपयोग करने की दरकार है.
खंडवा के उदाहरण से एक बड़ा सबक यह मिलता है कि सुरक्षा केवल कानून व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का भी विषय है. यदि समुदाय, प्रशासन और खुफिया एजेंसियां परस्पर विश्वास और सहयोग का वातावरण बनाए रखें तो ऐसे नेटवर्क लंबे समय तक पनप नहीं सकते. कुल मिलाकर खंडवा की यह घटना केवल नकली नोटों की तस्करी का मामला नहीं, बल्कि हमारे सुरक्षा ढांचे की परीक्षा है. इतिहास की संवेदनशील विरासत के बीच यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि किसी भी आतंकी या राष्ट्रविरोधी तत्व को दोबारा इस भूमि पर जगह न मिले, यही आधुनिक भारत की सुरक्षा नीति की बुनियादी कसौटी होनी चाहिए.
