
सौसर। गांव हो तो वैसा, जहां एक देवी, एक आस्था और एकजुटता की मिसाल हो। सौसर तहसील के ग्राम निमनी में नवरात्रि महोत्सव की यही अनूठी परंपरा 1960 से निरंतर चल रही है। यहाँ माता शेरावाली की स्थापना से आरंभ हुआ यह पर्व आज 65 वर्षों की आस्था और सद्भावना का प्रतीक बन चुका है।
ग्राम के बुजुर्गों के अनुसार, उस दौर में आर्थिक स्थिति बेहद विषम थी। गरीबी और अभावों के बावजूद गांववासियों ने हिम्मत नहीं हारी और एक मन होकर समिति का गठन किया। इस समिति में नत्थु बोडे, कृष्णा भोयर, संतोष भोयर, मुका लांजेवार, रामचंद्र सोनटक्के, गुलाब सोनटक्के, श्यामराव वाघ, मारोतराव वडोले, मरोतराव फिरके तथा दशरथ तेली जैसे गांव के वरिष्ठजन शामिल हुए थे।
बताया जाता है कि समिति ने कठिनाई से 10 रुपये राशि जुटाई और दशरथ तेली के घर के सामने छोटा-सा पंडाल बनाकर माँ शेरावाली की प्रतिमा स्थापित की। और दशरथ को पुजारी बनाया गया। उस प्रथम आयोजन की विशेषता यह रही कि जाति, धर्म और राजनीति की दीवारें गिर गईं। समस्त ग्रामवासी एक मंच पर जुटकर भक्ति और उल्लास के साथ नवरात्रि पर्व मनाने में शामिल हुए।
मां शेरावाली की असीम कृपा रही कि तब से लेकर आज तक ग्राम निमनी में केवल एक ही प्रतिमा की स्थापना की परंपरा निभाई जा रही है। पूरे गांव के लोग मिलकर उसी प्रतिमा की पूजा करते हैं और एक साथ भक्ति-साधना में रमे रहते हैं। इस सामूहिक आस्था ने गांव की पहचान ही बदल दी है।
अब 65 वर्षों बाद भी यह नवरात्रि महोत्सव उसी उत्साह, श्रद्धा और भाईचारे के साथ मनाया जाता है। विश्राम भोयर राजू वडस्कर का कहना है कि मां शेरावाली की कृपा दृष्टि ऐसे ही सदैव बनी रहे जिससे गांववासियों में एकता व भाईचारा यूं ही कायम रहे। बहरहाल निमनी गांव की नवरात्रि इस बात की मिसाल है कि जब ग्रामीण एकजुट होकर संकल्प लेते हैं तो आस्था और परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी और भी मजबूत होती चली जाती है।
