पर्यावरण संकट की जड़ बनती उपभोक्तावादी प्रवृत्ति

शुक्रवार को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया. यह केवल प्रतीकात्मक पौधारोपण करने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है. यह सोचने का अवसर है कि आखिर पृथ्वी पर बढ़ते पर्यावरणीय संकटों के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं. जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, जैव विविधता का क्षरण, जल संकट और प्रदूषण जैसी समस्याओं की जड़ में केवल तकनीकी या आर्थिक कारण नहीं हैं, बल्कि मनुष्य की अनियंत्रित इच्छाएं और असीमित उपभोग की प्रवृत्ति भी है.

मानव सभ्यता ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है. संचार, परिवहन, चिकित्सा और सूचना प्रौद्योगिकी ने जीवन को पहले की तुलना में कहीं अधिक सुविधाजनक बनाया है. इन उपलब्धियों पर गर्व करना स्वाभाविक है, किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब विकास का अर्थ केवल अधिक उपभोग और अधिक संसाधनों के दोहन तक सीमित होकर रह जाता है. मौजूदा दौर में व्यक्ति के सामने जो उपलब्ध है, उससे संतोष नहीं है और जो नहीं है, उसे प्राप्त करने की बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है. यही तृष्णा पर्यावरणीय संकट की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही है.

भारतीय चिंतन ने सदियों पहले इस समस्या की ओर संकेत किया था. संस्कृत के महान कवि भर्तृहरि ने कहा था कि समय नहीं बीतता, बल्कि हम बीत जाते हैं; तृष्णा नहीं बूढ़ी होती, हम बूढ़े हो जाते हैं. यह कथन आज पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है. दरअसल,आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने इच्छाओं को आवश्यकता का रूप दे दिया है. परिणामस्वरूप व्यक्ति, समाज और राष्ट्र सभी अधिकाधिक संसाधनों पर अधिकार जमाने की दौड़ में शामिल हो गए हैं.पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर बढ़ता दबाव इसी मानसिकता का परिणाम है.

जलवायु परिवर्तन का संकट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है. विकास के नाम पर जंगलों की कटाई, जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन पृथ्वी की सहनशीलता को चुनौती दे रहे हैं. विकसित देशों से लेकर विकासशील राष्ट्रों तक, सभी आर्थिक प्रगति की प्रतिस्पर्धा में पर्यावरणीय संतुलन को पीछे छोड़ते दिखाई देते हैं. इसका दुष्परिणाम पूरी मानवता को भुगतना पड़ रहा है.

ऐसे समय में टिकाऊ विकास या सस्टेनेबल डेवलपमेंट की अवधारणा महत्वपूर्ण बन जाती है. किंतु केवल नीतियों और योजनाओं से समस्या का समाधान संभव नहीं है.इसके लिए जीवन-दृष्टि में परिवर्तन आवश्यक है. भारतीय ज्ञान परंपराएं संयम, अपरिग्रह, त्याग और संतुलित उपभोग का संदेश देती हैं. हिंदू, जैन और बौद्ध विचारधाराएं मनुष्य को केवल अपने हित तक सीमित न रहकर समस्त सृष्टि के कल्याण की चिंता करने की प्रेरणा देती हैं. जाहिर है कि पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक मार्ग प्रकृति से अधिक लेने में नहीं, बल्कि अपनी आवश्यकताओं को समझने और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने में है. पृथ्वी की रक्षा तभी संभव है जब विकास और उपभोग के बीच संतुलन स्थापित किया जाए. विश्व पर्यावरण दिवस पर यही संकल्प सबसे अधिक प्रासंगिक है कि हम प्रकृति को संसाधन मात्र नहीं, बल्कि जीवन के आधार के रूप में देखें. यदि तृष्णा पर संयम नहीं लगाया गया, तो विकास की यह दौड़ अंतत: मानव सभ्यता को ही संकट में डाल देगी.पृथ्वी को बचाने के लिए हमें अपने भीतर झांकना होगा, क्योंकि पर्यावरण का भविष्य हमारे आचरण और जीवन-शैली से ही तय होगा.

 

 

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