पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां क्षेत्रीय संघर्ष का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. होर्मुज जलडमरूमध्य के ताजा टकराव ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को गंभीर चुनौती के सामने ला खड़ा किया है. दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल यह संकरा जलमार्ग लंबे समय से रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है. यदि यहां लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है, तो इसका प्रभाव केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एशिया, यूरोप और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाओं तक महसूस किया जाएगा.
होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस के बड़े हिस्से का परिवहन इसी रास्ते से होता है. ऐसे में किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव, जहाजरानी में बाधा या सुरक्षा जोखिम अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों पर तत्काल असर डालता है. पहले भी इस क्षेत्र में तनाव के दौरान तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है और निवेशकों की चिंता बढ़ी है.
यदि समुद्री परिवहन बाधित होता है, तो उसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पहले ही महामारी और विभिन्न भू-राजनीतिक संकटों के कारण दबाव झेल चुकी है. ऐसे में जहाजों के मार्ग बदलने, बीमा लागत बढऩे और माल ढुलाई महंगी होने से इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, उर्वरक और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों पर भी असर पड़ सकता है. महंगाई बढऩे का जोखिम भी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगा.
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का विषय है. भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है और खाड़ी क्षेत्र उसके प्रमुख ऊर्जा स्रोतों में शामिल है. यदि आपूर्ति बाधित होती है या अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो उसका असर घरेलू ईंधन कीमतों, परिवहन लागत, उद्योग और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है. इसलिए भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और सक्रिय कूटनीतिक प्रयास पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं.
हालांकि, संघर्ष के दौरान सामने आने वाले अनेक दावों और प्रतिदावों को भी सावधानी से देखने की आवश्यकता है. युद्ध की परिस्थितियों में दोनों पक्ष अपनी-अपनी रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक बढ़त के लिए सूचनाएं जारी करते हैं. ऐसे में किसी भी दावे को अंतिम सत्य मानने से पहले विश्वसनीय और स्वतंत्र स्रोतों से उसकी पुष्टि आवश्यक है. यही जिम्मेदार पत्रकारिता और विवेकपूर्ण नीति-निर्माण की बुनियाद भी है.
इतिहास बताता है कि सैन्य संघर्ष अंतत: वार्ता की मेज पर ही समाप्त होते हैं. होर्मुज जैसे संवेदनशील क्षेत्र में स्थायी समाधान केवल कूटनीति, संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही संभव है. वैश्विक शक्तियों और संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेदारी है कि वे तनाव कम करने के लिए प्रभावी पहल करें. क्योंकि यदि यह टकराव लंबा खिंचता है, तो इसकी कीमत केवल युद्धरत पक्ष ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को आर्थिक अस्थिरता, महंगाई और ऊर्जा संकट के रूप में चुकानी पड़ सकती है.
