रेवडिय़ों की राजनीति और वित्तीय अनुशासन की चुनौती

लोकतंत्र में जनकल्याणकारी योजनाएं सरकारों की जिम्मेदारी हैं, लेकिन जब कल्याण और चुनावी लाभ के बीच की रेखा धुंधली होने लगे तो उसका असर केवल सरकारी खजाने पर नहीं, बल्कि भविष्य की विकास यात्रा पर भी पड़ता है. भारतीय रिजर्व बैंक की ताजा स्टेट फाइनेंस रिपोर्ट इसी गंभीर चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित करती है. रिपोर्ट के अनुसार राज्यों का सकल वित्तीय घाटा, जो वर्ष 2017 से 2024 तक सामान्यत: 3 प्रतिशत से नीचे रहा, चालू वित्त वर्ष में बढक़र 3.3 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है. यह संकेत है कि कई राज्य अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता को दांव पर लगा रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों ने प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (कैश ट्रांसफर) आधारित योजनाओं का तेजी से विस्तार किया है. मध्यप्रदेश की लाडली बहना, झारखंड की मइयां सम्मान और हरियाणा की लाडो लक्ष्मी जैसी योजनाओं ने लाखों परिवारों को तत्काल राहत अवश्य दी है. गरीब और कमजोर वर्गों के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता. समस्या तब उत्पन्न होती है जब ऐसी योजनाएं स्थायी आर्थिक सुधारों के बजाय चुनावी प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन जाती हैं और उनके लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था नहीं होती.

रिपोर्ट यह भी बताती है कि कई राज्यों का सार्वजनिक कर्ज लगातार बढ़ रहा है. पंजाब और हिमाचल प्रदेश में यह पहले ही सकल राज्य घरेलू उत्पाद के 40 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुका है, जबकि राजस्थान भी इसी स्तर की ओर बढ़ रहा है. केरल का कर्ज भी चिंताजनक है. ऐसे हालात में ब्याज भुगतान और वेतन-पेंशन जैसे गैर-विकास व्यय का बोझ बढ़ता है, जिससे सडक़, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे उत्पादक क्षेत्रों में निवेश सीमित हो जाता है. इसका सीधा असर रोजगार सृजन और आर्थिक विकास पर पड़ता है. मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के लिए यह चेतावनी विशेष महत्व रखती है. राज्य ने सामाजिक सुरक्षा की कई महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन इनके साथ राजस्व बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और उद्योगों को प्रोत्साहन देने की रणनीति भी समानांतर चलनी चाहिए. केवल कर्ज लेकर कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार करना लंबे समय में वित्तीय संकट को जन्म दे सकता है.यह भी ध्यान रखना होगा कि सभी नकद हस्तांतरण योजनाएं स्वभावत: गलत नहीं हैं. यदि वे स्पष्ट पात्रता, पारदर्शी व्यवस्था और वित्तीय क्षमता के अनुरूप लागू हों तो गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. किंतु बिना वित्तीय अनुशासन के अंधाधुंध विस्तार भविष्य की पीढिय़ों पर कर्ज का बोझ बढ़ा देता है.आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकारें लोक-लुभावन घोषणाओं और दीर्घकालिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करें. चुनावी वादों का मूल्यांकन उनकी वित्तीय व्यवहार्यता के आधार पर भी होना चाहिए. साथ ही, कर संग्रह बढ़ाने, निवेश को प्रोत्साहित करने, गैर-जरूरी खर्चों पर नियंत्रण रखने और पूंजीगत निवेश को प्राथमिकता देने की नीति अपनानी होगी. लोककल्याण किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का मूल दायित्व है, लेकिन उसका आधार मजबूत अर्थव्यवस्था ही हो सकती है. यदि आज वित्तीय अनुशासन की अनदेखी की गई तो कल विकास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा,तीनों पर संकट गहरा सकता है. इसलिए राज्यों को अल्पकालिक राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी.

 

 

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