पंजीकृत सोसायटी में काम करना सरकारी कर्मचारी होने का सबूत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली, 16 जून (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि किसी पंजीकृत सोसायटी में काम करने वाले व्यक्ति को सरकारी कर्मचारी नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति मनमोहन की अंशकालीन कार्य दिवस पीठ ने त्रिपुरा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए ये टिप्पणी की, जिसमें याचिकाकर्ता को कथित सरकारी सेवा से बर्खास्त किए जाने के फैसले को बरकरार रखा गया था। अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ता ने अपनी रोजगार स्थिति को गलत तरीके से पेश किया था।

याचिकाकर्ता को अगरतला के एक बुनकर सेवा केंद्र से (जूनियर बुनकर के पद से) बर्खास्त कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने पहले त्रिपुरा आदिवासी कल्याण आवासीय शैक्षणिक संस्थान सोसायटी (टीटीडब्ल्यूआरईआईएस) में शिल्प शिक्षक के रूप में काम किया था। यह सोसाइटी राज्य सरकार के सहयोग से चलने वाला एक स्वायत्त निकाय है।

याचिकाकर्ता ने जूनियर बुनकर के पद के लिए पात्रता का दावा इस आधार पर किया था कि वह उक्त सोसायटी में काम करने के कारण सरकारी कर्मचारी है।

केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय द्वारा की गई जांच और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा सत्यापन के बाद यह पुष्टि हुई कि सोसाइटी एक सरकारी विभाग नहीं बल्कि एक पंजीकृत सोसायटी है।

पीठ ने याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की, “अनुच्छेद 12 के तहत एक सोसायटी होने से वहां काम करने वाला व्यक्ति सरकारी कर्मचारी नहीं बन जाता है।”

शीर्ष अदालत ने त्रिपुरा उच्च न्यायालय के फैसले से सहमति जताई।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1965 के नियम 2(एच) के तहत, एक सरकारी कर्मचारी वह व्यक्ति होना चाहिए जो केंद्र या राज्य सरकार के तहत एक सिविल पद रखता हो। चूंकि सोसाइटी एक सरकारी विभाग नहीं है, इसलिए इसमें शिल्प शिक्षक का पद एक सिविल पद नहीं है।

न्यायालय ने कहा, “यह एक स्थापित प्रस्ताव है कि गलत बयानी या तथ्यों को छिपाकर ली गई नियुक्तियाँ निरस्त करने योग्य हैं।”

शीर्ष अदालत ने त्रिपुरा उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और याचिकाकर्ता की विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया।

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