जी-7 में भारत की प्रमुख चिंताओं में शामिल है समुद्री सुरक्षा, रक्षा और एसएमआर का सह-उत्पादन

जयंत रॉय चौधरी से

नयी दिल्ली, 17 जून (वार्ता) फ्रांस के खूबसूरत शहर एवियन-लेस-बैंस में जारी जी-7 बैठक में भारत की प्रमुख चिंताएं आयातित कच्चे तेल और उर्वरक पर अपनी अधिक निर्भरता को देखते हुए समुद्री मार्गों की भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना, उन्नत सैन्य साजो-सामान और छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टरों (एसएमआर) के सह-उत्पादन में यूरोपीय देशों को साथ जोड़ना तथा बदलती वास्तविकताओं को दर्शाने के लिए संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक वित्तीय प्रणालियों में ढांचागत सुधारों के लिए पश्चिमी शक्तियों पर दबाव बनाना है।

भारत के शीर्ष वार्ताकारों ने कहा है कि भारत ने पश्चिम एशिया के हालिया संघर्ष के दौरान खुले समुद्र में अपने नाविकों की मौत के मुद्दे पर अपनी चिंताएं पहले ही व्यक्त कर दी हैं, लेकिन वह ‘सभी पक्षों के हितों में’ एक ऐसी व्यवस्था भी सुनिश्चित करना चाहेगा, जिससे दुनिया के समुद्री मार्ग और व्यस्त समुद्री मार्ग खुले रहें और भू-राजनीतिक तनावों से अप्रभावित रहें।

अधिकारियों का कहना है कि हालांकि हाल के अमेरिका-ईरान शांति समझौते ने खाड़ी में तनाव कम कर दिया है, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यस्त मार्गों में से एक बना हुआ है। भारत के लिए, जो अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 80 प्रतिशत आयात करता है, निर्बाध नौवहन एक आर्थिक अनिवार्यता है। इसी तरह ऊर्जा असुरक्षा और भू-राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा यूरोप भी मानता है कि यह मार्ग समान रूप से महत्वपूर्ण है और सभी संबंधित पक्षों को संयुक्त रूप से इस लक्ष्य की ओर काम करना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा गश्त के लिए फ्रांस का प्रस्ताव एक नयी भू-राजनीतिक वास्तविकता की झलक पेश करता है। अधिकारियों ने बताया, “भारत अब केवल सुरक्षा प्रणालियों के इस्तेमाल तक सीमित ही नहीं रह गया है और उसे सुरक्षा प्रदान करने में मदद करने के लिए भी लगातार कहा जा रहा है।”

पूर्व राजदूत और ‘इंडियाज वर्ल्ड’, ‘ह्वेयर बॉर्डर्स ब्लीड’ जैसी पुस्तकों के लेखक राजीव डोगरा ने कहा, “भारत, जो कई वर्षों से जी-7 में आमंत्रित सदस्य रहा है, हमेशा इस बात का इच्छुक रहा है कि जब महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हो तो वह भी उनमें मौजूद रहे। यह रुचि इस शक्तिशाली संगठन के प्रभाव और शक्ति में वर्षों से आयी कमी के बावजूद बनी हुई है।”

दशकों तक जी-7 ने समृद्ध देशों के एक ऐसे क्लब का प्रतिनिधित्व किया, जो वैश्वीकरण के नियम तय कर सकता था। हालांकि यह ‘क्लब’ अब अपनी शक्ति की सीमाओं का सामना कर रहा है। फिर भी इसके सदस्य देश वित्त, प्रौद्योगिकी और सैन्य क्षमता पर हावी हैं और भारत को लगता है कि वह इसके जरिये अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

जी-7 की ओर से यूक्रेन-रूस के बीच समझौता कराने का प्रयास और दक्षिण चीन सागर को लेकर चिंताएं भी इसी नजरिये से देखी जा रही हैं, क्योंकि भारत को रूस से आने वाले तेल और काला सागर क्षेत्र से आने वाले उर्वरक के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।अधिकारियों ने कहा है कि जी-7 में जिस एक और मुद्दे पर ध्यान आकर्षित किया जा रहा है, वह है ‘भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक गलियारा’ यानी आईएमईसी का पुनरुद्धार।

जब 2023 में इस गलियारे को शुरू किया गया था, तब कई विश्लेषकों ने इसे मुख्य रूप से चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई) के प्रतीकात्मक जवाब के रूप में देखा था। तीन साल बाद पश्चिम एशिया में संघर्ष के कई दौर देखने के बाद, यह मार्ग अब एक रणनीतिक आवश्यकता जैसा दिखने लगा है। इस क्षेत्र में संघर्षों के कारण पैदा हुए अवरोधों और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की संवेदनशीलता ने किसी भी एक व्यापारिक ढांचे पर अत्यधिक निर्भर रहने के जोखिमों को उजागर कर दिया है।

अधिकारियों ने कहा, “जी-7 के एजेंडे में अब कृत्रिम बुद्धिमता शासन, उन्नत रक्षा उत्पादन और छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर (एसएमआर) शामिल हैं और भारत अपनी आवश्यकताओं को उस एजेंडे के अनुरूप ढालना चाहता है। हम ऐसी चर्चाओं की उम्मीद कर रहे हैं, जिनमें भारत सह-निर्माता की भूमिका चाहता है।”

रक्षा के मोर्चे पर, भारत हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (एचएएल) और जीई के एफ-414 फाइटर जेट इंजनों के सह-उत्पादन के लिए समझौते के करीब है। इसके साथ ही भारत के साथ राफेल युद्धक विमान के संयुक्त उत्पादन की योजना, स्कॉर्पीन-श्रेणी की पनडुब्बियों के संभावित सह-उत्पादन की परियोजनाएं, हवा से जमीन पर मार करने वाली कई हथियार प्रणालियों और रक्षा उपकरणों के लिए एक विद्युत प्रणोदन प्रणाली के स्थानीय उत्पादन पर भी काम चल रहा है।

यह सर्वविदित है कि भारत छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों पर फ्रांस और रूस के साथ काम कर रहा है, जिसमें ईडीएफ यानी ‘इलेक्ट्रिसिटी डी फ्रांस’ की सहायक कंपनी ‘नुवर्ड एसएमआर’ भारत की भेल के साथ सहयोग कर रही है।

 

 

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