पाक अधिकृत कश्मीर में तेजी से बिगड़ते हालात केवल पाकिस्तान का आंतरिक संकट नहीं हैं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से भी सीधे जुड़े हुए हैं. रावलाकोट, मुज़फ़्$फराबाद और कोटली जैसे क्षेत्रों में नागरिक प्रदर्शनों पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों के हताहत होने के दावे और व्यापक असंतोष इस बात का संकेत हैं कि पीओके में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता गहराती जा रही है. ऐसे समय में भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह स्थिति पर लगातार पैनी नजर बनाए रखे और सीमा पर किसी भी संभावित चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार रहे. दरअसल, ‘जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ के नेतृत्व में निकाले गए लांग मार्च पर सुरक्षा बलों ने बल प्रयोग किया. प्रदर्शनकारी बिजली की बढ़ी हुई दरों, खाद्य सब्सिडी समाप्त किए जाने, महंगाई, प्रशासनिक दमन और नागरिक अधिकारों के हनन के विरोध में सडक़ पर उतरे थे. विभिन्न स्रोतों ने कई लोगों के मारे जाने और बड़ी संख्या में घायल होने के दावे किए हैं. जाहिर है पाकिस्तान सेना से पीओके में जनता का असंतोष अब दबाए नहीं दब रहा है.
भारत सरकार ने इन घटनाओं और वहां कराए जा रहे तथाकथित विधानसभा चुनावों पर स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया है. विदेश मंत्रालय ने कहा है कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में आयोजित किए जा रहे ये तथाकथित चुनाव केवल एक दिखावटी प्रक्रिया हैं. भारत ने यह भी कहा कि पाकिस्तान अपने अवैध कब्जे और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को छिपाने का प्रयास कर रहा है तथा वहां के जन-प्रदर्शन आर्थिक शोषण और नागरिक अधिकारों के हनन का परिणाम हैं. भारत ने पाकिस्तान सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग और दमनात्मक कार्रवाइयों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि वहां के लोगों के लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए. यह प्रतिक्रिया भारत की उस स्थायी नीति के अनुरूप है, जिसके अनुसार पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पीओके भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग है.
इन घटनाओं का एक महत्वपूर्ण सुरक्षा पक्ष भी है. इतिहास बताता है कि पाकिस्तान में जब भी आंतरिक संकट गहराता है, तब कई बार नियंत्रण रेखा पर तनाव बढ़ाने या भारत विरोधी गतिविधियों को हवा देने की कोशिशें देखी गई हैं. ऐसे में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और सेना को किसी भी संभावित घुसपैठ, आतंकवादी गतिविधि या सीमा पार उकसावे की आशंका को हल्के में नहीं लेना चाहिए. सीमा पर सतर्कता, खुफिया तंत्र की सक्रियता और कूटनीतिक स्तर पर निरंतर दबाव. तीनों की समान रूप से आवश्यकता है.
पीओके में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध, बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती और आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं पर आतंक-रोधी कानूनों के तहत कार्रवाई की खबरें भी चिंता बढ़ाती हैं. किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज को बल प्रयोग से लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता. यदि वहां के लोगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो अस्थिरता और गहरा सकती है.
भारत को भावनाओं के बजाय दूरदर्शिता के साथ आगे बढऩा होगा. एक ओर उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकारों के प्रश्न को मजबूती से उठाना चाहिए, वहीं दूसरी ओर अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आंतरिक तैयारियों में कोई ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए. पीओके की मौजूदा अशांति पाकिस्तान के लिए चेतावनी है, लेकिन भारत के लिए भी यह याद दिलाने वाली स्थिति है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर सतर्कता ही सबसे बड़ी शक्ति होती है.
