संकट काल में सुरक्षा कवच के रूप में टीएमसी को मिला कांग्रेस का साथ

प्रवेश कुमार मिश्र नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद बहुस्तरीय संकटों से जूझ रहीं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी व उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी व राहुल गांधी से मुलाकात कोई सामान्य मुलाकात नहीं है बल्कि इसे राजनीति में नए समीकरण का उदय व सकारात्मक संदेश का आगाज माना जा रहा है.
राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि यह मुलाकात महज इंडिया समूह के समन्वय की सामान्य कवायद नहीं है, बल्कि गहरे आंतरिक संकट से घिरी एक क्षेत्रीय पार्टी की राष्ट्रीय शरणस्थली तलाशने की छटपटाहट है.

वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है. ऐसे में क्षेत्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ चुकीं ममता बनर्जी के लिए देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की शरण में जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं सूझा. बंगाल की शेरनी कही जाने वाली ममता बनर्जी ने जिस कांग्रेस से बगावत कर टीएमसी को सत्ता तक पहुंचाया, वही आज अपने दल में मचे उथल-पुथल व बगावत से दल को बचाने और एक राजनीतिक कवच तैयार करने के लिए कांग्रेसी सहयोग पाने की कोशिश में हैं. हालांकि राजनीतिक गलियारों में इस समय सबसे बड़ी चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या तृणमूल कांग्रेस का वजूद अंततः कांग्रेस में विलीन होने जा रहा है? परंतु आधिकारिक तौर पर दोनों पार्टियों के सूत्र किसी भी विलय की बात से इनकार कर रहे हैं और इसे केवल 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए इंडिया गठबंधन को मजबूत करने की रणनीति बता रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि इस मुलाकात के राजनीतिक मायने केवल बंगाल तक सीमित नहीं हैं. यह घटनाक्रम देश की विपक्षी राजनीति में क्षेत्रीय दलों के घटते प्रभाव और कांग्रेस के पुनरुत्थान को रेखांकित कर रहा है. कल तक जो क्षेत्रीय क्षत्रप कांग्रेस को दरकिनार कर खुद विपक्षी एकता का चेहरा बनने की होड़ में थे, आज वे अपने वजूद को बचाने के लिए उसी कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करने पर विवश हैं. कांग्रेस ने भी शिवसेना उद्धव गुट की तर्ज पर टीएमसी के कठिन वक्त में अपने कंधे व‌ हाथ का सहारा देकर बड़े भाई की तरह यह साबित कर दिया है कि वह केवल अपनी जीत के लिए नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों को संकट से उबारने के लिए भी प्रतिबद्ध है. टीएमसी का कांग्रेस की शरण में आना यह तय करता है कि 2029 की लड़ाई अब सीधे कांग्रेस के चेहरे पर इंडिया बनाम राजग की होगी, जहां क्षेत्रीय दल कांग्रेस की छत्रछाया में ही सुरक्षित रह पाएंगे.

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