देश इस समय भीषण गर्मी और जल संकट की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है. शहरों से लेकर गांवों तक पेयजल की समस्या गहराती जा रही है. यहां तक कि इंदौर जैसे शहर में भी जल संकट विकराल हो गया है जहां, नर्मदा का जल पर्याप्त मात्रा में आता है. केंद्रीय जल आयोग के ताजा आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं. देश के 166 प्रमुख जलाशयों में 2 अप्रैल को जहां 85.698 बीसीएम पानी उपलब्ध था, वहीं 21 मई तक यह घटकर 60.830 बीसीएम रह गया. यानी महज सात हफ्तों में जल भंडारण में भारी गिरावट दर्ज की गई है. अब इन जलाशयों में कुल क्षमता का केवल 33.14 प्रतिशत पानी बचा है. यह स्थिति बताती है कि आने वाले दिनों में जल प्रबंधन देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनने वाला है.
हालांकि राहत की बात यह है कि मौजूदा जल भंडारण पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर है. बीते साल 21 मई को इन जलाशयों में 54.337 बीसीएम पानी था, जबकि दस वर्षों का औसत 48.901 बीसीएम रहा है. इसका अर्थ यह है कि स्थिति फिलहाल नियंत्रण में दिखाई देती है, लेकिन तेजी से घटते जल स्तर को हल्के में नहीं लिया जा सकता. खासतौर पर तब, जब मौसम विभाग और विशेषज्ञ अल-नीनो के प्रभाव को लेकर पहले ही आशंका जता चुके हैं. यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहा, तो जल संकट और गंभीर हो सकता है.
सबसे अधिक चिंता नदी बेसिनों की स्थिति को लेकर है. कृष्णा बेसिन केवल 18.04 प्रतिशत पर पहुंच चुका है. गंगा बेसिन 44.64 प्रतिशत और महानदी 36.84 प्रतिशत पर है. यह आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि देश के कई हिस्सों में सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है. मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में लू का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है. खजुराहो और नौगांव में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचना सामान्य मौसम परिवर्तन नहीं, बल्कि जलवायु संकट की गंभीर चेतावनी है.
असल समस्या केवल कम बारिश नहीं है. जलाशयों की संग्रहण क्षमता भी लगातार घट रही है. गाद जमने, वनों की कटाई, जलग्रहण क्षेत्रों के क्षरण और प्राकृतिक जल मार्गों में अवरोध जैसी समस्याओं ने स्थिति को और जटिल बना दिया है. यदि समय रहते इन कारणों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो हर वर्ष गर्मियों में यही संकट और विकराल रूप में सामने आएगा. जाहिर है जल संकट का एक बड़ा कारण जल कुप्रबंधन भी है. खासतौर पर
स्थानीय निकाय और पंचायती राज संस्थाएं
जल प्रबंधन के संदर्भ में पूरी तरह से नाकाम रही हैं. यह भी चिंताजनक है कि जल आपूर्ति का 30 $फीसदी हिस्सा या तो लीकेज के कारण या अन्य गड़बडिय़ों के कारण व्यर्थ बह जाता है. इधर, हालांकि यह भी सच है कि देश में जल संरक्षण को लेकर योजनाएं बनीं, लेकिन उनका प्रभाव जमीन पर सीमित दिखाई देता है. आज आवश्यकता केवल नए बांध बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा जलाशयों की क्षमता बढ़ाने, वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाने और स्थानीय जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने की है. गांवों के तालाब, कुएं और पारंपरिक जल संरचनाएं कभी भारत की जल सुरक्षा का आधार थीं. आधुनिक विकास की दौड़ में इन्हें उपेक्षित कर दिया गया.
अब समय आ गया है कि जल संकट को केवल मौसमी समस्या मानने की भूल बंद की जाए. यह राष्ट्रीय सुरक्षा, कृषि अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा प्रश्न बन चुका है. सरकारों के साथ समाज को भी पानी बचाने की संस्कृति अपनानी होगी. क्योंकि आने वाले वर्षों में पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का सबसे बड़ा आधार बनने वाला है.
