इस बार का मानसून केवल बारिश नहीं लाया है, उसने देश के विकास मॉडल पर भी कई असहज प्रश्न खड़े कर दिए हैं. गुजरात से लेकर महाराष्ट्र, दिल्ली-एनसीआर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम और दक्षिण भारत तक हर ओर एक जैसी तस्वीर दिखाई दे रही है. कहीं शहर पानी में डूबे हैं, कहीं पहाड़ दरक रहे हैं, कहीं सडक़ें बह गई हैं तो कहीं लोगों को घर छोडक़र सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ रहा है. यह मान लेना आसान है कि असामान्य वर्षा ही इस तबाही का कारण है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक गंभीर है. दरअसल, पानी में केवल शहर नहीं डूब रहे, बल्कि हमारी दशकों पुरानी अव्यवस्थित टाउन प्लानिंग और विकास की सोच भी बह रही है. दरअसल,हर मानसून के साथ वही दृश्य दोहराए जाते हैं. कुछ घंटों की बारिश के बाद सडक़ें नदियों में बदल जाती हैं, अंडरपास जलाशय बन जाते हैं, अस्पतालों और सरकारी कार्यालयों में पानी भर जाता है और करोड़ों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति देखते ही देखते नष्ट हो जाती है. इसके बावजूद हर वर्ष इसे प्राकृतिक आपदा कहकर भूल जाने की प्रवृत्ति बनी रहती है.
असल समस्या बारिश नहीं, बल्कि वह विकास है जिसने प्रकृति के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा. शहरों के तालाब पाट दिए गए, नालों पर कॉलोनियां बस गईं, नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण की अनुमति मिल गई और कंक्रीट के जंगल इस तेजी से फैलते गए कि जमीन की पानी सोखने की क्षमता लगभग समाप्त हो गई. जब पानी के प्राकृतिक रास्ते बंद कर दिए जाएंगे तो वह अपना रास्ता स्वयं बनाएगा, और वही आज बाढ़ और जलभराव के रूप में दिखाई दे रहा है.
इससे भी अधिक चिंता का विषय हमारी टाउन प्लानिंग की सोच है. अधिकांश शहरों के मास्टर प्लान कागजों तक सीमित हैं. जहां योजनाएं हैं, वहां उनका पालन नहीं होता और जहां नियम हैं, वहां राजनीतिक और आर्थिक दबाव उन्हें निष्प्रभावी बना देते हैं. नगर निगम, विकास प्राधिकरण, सिंचाई विभाग और पर्यावरण एजेंसियों के बीच समन्वय का अभाव स्थिति को और जटिल बना देता है. परिणाम यह होता है कि एक विभाग सडक़ बनाता है, दूसरा नाला बंद कर देता है और तीसरा जलभराव दूर करने के लिए करोड़ों रुपये की नई योजना घोषित कर देता है.इसी के साथ जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गहरा कर दिया है. अब वर्षा का स्वरूप बदल चुका है. पहले जहां बारिश कई दिनों में होती थी, वहीं अब कुछ घंटों में ही पूरे महीने जितना पानी बरस जाता है. दुर्भाग्य यह है कि हमारे शहरों की जल निकासी व्यवस्था आज भी पुराने मानकों पर आधारित है. बदलते मौसम के अनुरूप न तो ड्रेनेज सिस्टम का विस्तार हुआ और न ही शहरी नियोजन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पर्याप्त महत्व मिला.
यह समय केवल राहत पैकेज घोषित करने या मुआवजा बांटने का नहीं है. आवश्यकता इस बात की है कि देश में शहरी नियोजन की पूरी व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा की जाए. प्रत्येक शहर का वैज्ञानिक ड्रेनेज मास्टर प्लान बनाया जाए. नदियों के बाढ़ क्षेत्र, तालाबों, आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को कानूनी संरक्षण मिले. निर्माण की अनुमति देने से पहले जल निकासी और पर्यावरणीय प्रभाव का कठोर मूल्यांकन अनिवार्य किया जाए. साथ ही, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई केवल कागजी अभियान न होकर राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रमाण बने.बहरहाल,
बाढ़ का पानी कुछ दिनों में उतर जाएगा, लेकिन यदि हमारी सोच नहीं बदली तो अनियोजित विकास की यह बाढ़ आने वाले वर्षों में देश के आर्थिक संसाधनों, शहरी व्यवस्था और नागरिकों के विश्वास को लगातार बहाती रहेगी. अब निर्णय सरकारों को करना है कि वे हर वर्ष आपदा का इंतजार करेंगी या स्थायी समाधान का रास्ता चुनेंगी.
