इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली महा-वार्ता विफल हो गई है। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर दोषारोपण किया है, जिससे दो हफ्तों के सीजफायर पर संकट गहरा गया है।
पाकिस्तान में हुई 21 घंटे लंबी शांति वार्ता के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता नहीं हो सका। इससे दो हफ्तों के लिए लागू किए गए सीजफायर का भविष्य भी अनिश्चित हो गया है। दोनों देश बातचीत के विफल होने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। ईरान का कहना है कि अमेरिका की सख्त और अतिरिक्त मांगों के कारण समझौता संभव नहीं हो पाया।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि तेहरान ने 47 सालों में पहली बार अमेरिका के साथ उच्च-स्तरीय सीधी बातचीत अच्छे इरादे से शुरू की थी। उन्होंने दावा किया कि बातचीत लगभग सफल होने वाली थी, लेकिन अंतिम चरण में अमेरिका के रवैये के कारण यह टूट गई। उनके मुताबिक, वाशिंगटन ने आखिरी समय में अपना रुख कड़ा कर लिया, लक्ष्य बदले और वार्ता में बाधाएं खड़ी कीं।
गालिबाफ का अमेरिका पर निशाना साधा
वहीं, ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने भी अमेरिका पर निशाना साधा। ‘इस्लामाबाद टॉक्स’ के बाद जारी बयान में उन्होंने कहा कि इस वार्ता में असफलता अमेरिका की वजह से हुई। उन्होंने कहा कि ईरान के पास समझौते की नीयत और इच्छा दोनों थीं, लेकिन पिछले संघर्षों के अनुभव के कारण उन्हें अमेरिका पर भरोसा नहीं था।
गालिबाफ ने यह भी कहा कि विरोधी पक्ष ईरानी प्रतिनिधिमंडल का भरोसा जीतने में नाकाम रहा। उन्होंने ईरान की जनता का आभार जताते हुए कहा कि देश के लोगों के समर्थन ने प्रतिनिधिमंडल को मजबूती दी।
इस्लामाबाद में चल रही थी वार्ता
पाकिस्तान की मेजबानी में 9-10 अप्रैल को इस्लामाबाद में यह शांति वार्ता आयोजित की गई थी। 40 दिनों के संघर्ष के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते के सीजफायर का ऐलान किया था। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व जेडी वेंस ने किया, जबकि ईरानी पक्ष की कमान गालिबाफ के हाथ में थी।
रविवार को जेडी वेंस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ किया कि यह वार्ता बेनतीजा रही। उन्होंने कहा कि समझौता न होना ईरान के हित में नहीं है और दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी बरकरार हैं। शांति वार्ता विफल होने के बाद से मिडिल ईस्ट में एक बार फिर युद्ध की आशंका तेज हो गई है।
