
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने न्यायालयीन प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के मामले को सख्ती से लिया। एकलपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की गवाही पूरी होने के डेढ़ वर्ष से अधिक समय बाद गवाही में बदलाव करने का आवेदन पेश किया गया था, हाईकोर्ट के आदेशानुसार ऐसा करना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग और प्रोबेट कार्यवाही के निराकरण में देरी करने का प्रयास है। इस मत के साथ न्यायालय ने याचिकाकर्ता सुमन श्रीवास्तव व अंकित श्रीवास्तव पर पांच हजार रुपये जुर्माने के साथ याचिका निरस्त कर दी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 30 दिन के भीतर यह राशि हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के खाते में जमा कराने के निर्देश दिए।
दरअसल, जबलपुर निवासी सुमन श्रीवास्तव ने संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में ट्रायल कोर्ट में अपनी गवाही के पुन: बयान कराने के लिए एक आवेदन पेश किया था। ट्रायल कोर्ट ने उक्त आवेदन खारिज कर दिया, इसलिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। मामले पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता और याचिकाकर्ता का पुत्र एड. अंकित श्रीवास्तव हाजिर हुए। याचिकाकर्ता का बयान जुलाई 2024 में पूरा हुआ और उसने अपने बयान में वसीयत के निष्पादन से संबंधित प्रोबेट आवेदन में किए गए दावों के पक्ष में बयान दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक आवेदन पेश कर गवाह के रूप में दोबारा पेश करने का अनुरोध दिसंबर 2025 में प्रस्तुत किया था। याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के पीठासीन न्यायाधीश पर आरोप लगाया था कि न्यायाधीश ने बयान के उस हिस्से को टाइप नहीं कराया गया, जिसमें जनवरी 2020 में आवेदक पर बंदूकें तानी गई थीं, उसने ऐसा बयान दिया था। हाईकोर्ट ने दलीलों को अस्वीकार करते हुए याचिका निरस्त कर दी। पूर्व में भी जिला न्यायाधीश द्वारा सुमन श्रीवास्तव और अंकित श्रीवास्तव पर न्यायाधीश वर्ग पर अनर्गल टिप्पणी करने और झूठे आरोप लगाने पर दो हजार रुपये का जुर्माना लगाया था।
