प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के कथित महासचिव देवूजी का सरेंडर केवल एक संगठनात्मक घटना नहीं है, बल्कि यह उस लंबे और रक्तरंजित अध्याय के अंत का संकेत है, जिसने दशकों तक भारत के अनेक राज्यों को हिंसा की आग में झोंक रखा था. जिस व्यक्ति पर विभिन्न राज्यों में एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और जिस पर सैकड़ों सुरक्षाकर्मियों की हत्या में प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका के आरोप हैं, उसका हथियार छोडऩा यह बताता है कि बंदूक की राजनीति की जमीन खिसक चुकी है.
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने की जो समय सीमा तय की है, वह अब केवल राजनीतिक घोषणा नहीं रह गई है, बल्कि जमीनी हकीकत का रूप लेती दिख रही है. पिछले एक दशक में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या में आई भारी कमी इसका प्रमाण है. 2013 में जहां 182 जिले इस समस्या से प्रभावित थे, वहीं अब यह संख्या सिमटकर मु_ीभर रह गई है. यह परिवर्तन स्वत: नहीं आया, बल्कि सुनियोजित रणनीति, बेहतर खुफिया तंत्र, स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बलों के समन्वय तथा राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण संभव हुआ है.ऑपरेशन कगार जैसे अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य अब हिंसक चुनौती के सामने झुकने वाला नहीं है. अबुजमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में शीर्ष माओवादी नेताओं का मारा जाना और अनेक वरिष्ठ कैडरों का आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि संगठन वैचारिक और सैन्य दोनों स्तरों पर कमजोर पड़ा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस पर दिया गया वक्तव्य भी इसी आत्मविश्वास को दर्शाता है कि देश अब माओवादी आतंक के अंतिम दौर से गुजर रहा है. हालांकि, केवल सुरक्षा अभियान ही स्थायी समाधान नहीं हो सकता. यह सच है कि बंदूक के दम पर ‘लाल क्रांति’ लाने का सपना अब बिखर रहा है, परंतु जिन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में यह आंदोलन पनपा, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. आदिवासी अंचलों में दशकों तक बुनियादी सुविधाओं का अभाव, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, रोजगार के सीमित अवसर और प्रशासन से दूरी ने असंतोष को जन्म दिया. नक्सली संगठनों ने इसी असंतोष को हथियार बनाया.अब जब सुरक्षा बलों ने इन इलाकों में राज्य की उपस्थिति मजबूत कर दी है, तो अगला और अधिक महत्वपूर्ण चरण विकास का है. सडक़ों, मोबाइल नेटवर्क, स्कूलों, आईटीआई और स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार युद्धस्तर पर होना चाहिए. जनजातीय युवाओं को स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार उपलब्ध कराना, वन उपज के लिए बेहतर मूल्य सुनिश्चित करना और कौशल विकास कार्यक्रमों को जमीन पर उतारना समय की मांग है. आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं के पुनर्वास की पारदर्शी और प्रभावी नीति भी उतनी ही आवश्यक है, ताकि वे मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन जी सकें.सरकार ने सुरक्षा मोर्चे पर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है. अब अपेक्षा है कि वही प्रतिबद्धता विकास और विश्वास निर्माण के मोर्चे पर भी दिखाई दे. यदि बंदूक की जगह किताब, बारूद की जगह रोजगार और भय की जगह भरोसा स्थापित हो गया, तो न केवल नक्सलवाद का अंत होगा, बल्कि इन क्षेत्रों का वास्तविक उत्थान भी सुनिश्चित होगा. यही स्वतंत्र भारत की सच्ची विजय होगी. कुल मिलाकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने खुद की मॉनिटरिंग में नक्सलवाद के सफाए के इस महत्वपूर्ण अभियान को जिस तरह से चलाया, वो प्रशंसनीय है. पिछले एक वर्ष के दौरान अमित शाह अमुमन प्रत्येक महीने छत्तीसगढ़ की यात्रा पर आए हैं. यहां आकर उन्होंने खुद अभियान की समीक्षा की है. जाहिर है यह सब उन्हीं प्रयासों का नतीजा है.
