भारत सरकार द्वारा जारी की गई पहली व्यापक और औपचारिक आतंकवाद-विरोधी नीति ‘प्रहार’ केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलते सुरक्षा परिवेश के प्रति भारत की स्पष्ट और दृढ़ घोषणा है. गृह मंत्रालय द्वारा जारी यह नीति इस बात का संकेत देती है कि आतंकवाद अब पारंपरिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है. उसका स्वरूप बदला है, माध्यम बदले हैं और लक्ष्य भी अधिक जटिल हुए हैं. ऐसे में भारत की प्रतिक्रिया भी उतनी ही व्यापक और बहुआयामी होनी चाहिए थी. ‘प्रहार’ इसी सोच का परिणाम है.
इस आठ पन्नों के दस्तावेज की बुनियाद ‘जीरो टॉलरेंस’ के सिद्धांत पर रखी गई है. यह स्पष्ट संदेश है कि आतंकवाद के प्रति किसी प्रकार की नरमी या अस्पष्टता अब स्वीकार्य नहीं होगी. नीति के सात स्तंभ,प्रीवेंशन, रिस्पांसेस, एग्रीगेटिंग इंटरनल कैपेसिटीज, ह्यूमन राइट्स, अटेनुएटिंग एनेबलिंग कंडीशंस, अलाइनिंग इंटरनेशनल एफर्ट्स और रिकवरी एंड रेजिलिएंस ( प्रहार का फुल फॉर्म ),सुरक्षा के समग्र दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं. यह केवल हमले के बाद की प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि हमले को पहले ही रोकने, संस्थागत समन्वय बढ़ाने और समाज को फिर से खड़ा करने की रणनीति भी शामिल करती है.
सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी निर्णय यह है कि साइबर हमलों को भी आतंकवादी कृत्य की श्रेणी में शामिल किया गया है. मौजूदा दौर में जब पावर ग्रिड, रेलवे नेटवर्क, बैंकिंग सिस्टम और परमाणु प्रतिष्ठान डिजिटल तकनीक पर निर्भर हैं, तब एक बड़ा साइबर अटैक किसी बम धमाके से कम विनाशकारी नहीं हो सकता. क्रिमिनल हैकर्स या शत्रु राष्ट्रों द्वारा प्रायोजित साइबर हमले यदि देश की अर्थव्यवस्था या महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाते हैं, तो उन्हें आतंकवाद की संज्ञा देना समय की मांग थी. यह कदम भारत की सुरक्षा नीति को 21वीं सदी के खतरों के अनुरूप बनाता है.
ड्रोन और रोबोटिक्स के माध्यम से हथियार तथा नशीले पदार्थों की तस्करी, विशेषकर पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में, एक गंभीर चुनौती बन चुकी है. ‘प्रहार’ इस खतरे को स्वीकार करता है और तकनीकी निगरानी तथा समन्वित कार्रवाई पर बल देता है. इसी प्रकार डार्क वेब, क्रिप्टो वॉलेट और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म के जरिए होने वाली आतंकी फंडिंग पर नियंत्रण की योजना इस नीति को आधुनिक बनाती है.इस नीति में
कानूनी प्रक्रिया में सुधार का प्रस्ताव भी उल्लेखनीय है. दरअसल,एफआईआर से लेकर अंतिम सजा तक हर चरण में कानूनी विशेषज्ञों की भागीदारी सुनिश्चित करने का सुझाव इस बात का प्रमाण है कि सरकार केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि दोषसिद्धि दर बढ़ाने पर भी जोर दे रही है. मल्टी-एजेंसी सेंटर को मजबूत कर रीयल-टाइम इंटेलिजेंस साझा करने की व्यवस्था संघीय ढांचे में बेहतर तालमेल का संकेत देती है.साथ ही, ‘प्रहार’ यह स्पष्ट करता है कि आतंकवाद को किसी धर्म, जाति या राष्ट्रीयता से नहीं जोड़ा जाएगा. यह संतुलन आवश्यक है, क्योंकि कठोरता के साथ संवैधानिक मूल्यों और मानवाधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन ही किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा है. दरअसल,नीति बनाना पहला कदम है,असली चुनौती इसके प्रभावी क्रियान्वयन में होगी. यदि केंद्र और राज्य एजेंसियां समन्वय, तकनीकी क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इसे लागू करती हैं, तो ‘प्रहार’ भारत की आंतरिक सुरक्षा संरचना को नई मजबूती दे सकता है. बदलते आतंकवाद के दौर में यह नीति एक निर्णायक प्रहार साबित हो सकती है.
