देश भर के लगभग 40 और मध्य प्रदेश के चार से ज्यादा शहरों में इस समय तापमान 44 से 45 डिग्री चल रहा है. पहाड़ी प्रदेशों को छोड़ दें तो पूरे देश में ही अमूमन 40 डिग्री टेंपरेचर की गर्मी है. दरअसल,यह अब अपवाद नहीं, बल्कि एक खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत बन चुका है. देश के बड़े हिस्से,दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना,इन दिनों जिस असामान्य गर्मी की चपेट में हैं, उसका कारण केवल मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि ‘हॉट डोम’ यानी उष्मा का छत्रीनुमा गुंबद है. यह स्थिति तब बनती है, जब उच्च दबाव की प्रणाली किसी क्षेत्र में स्थिर हो जाती है और गर्म हवा को धरती के करीब कैद कर देती है. नतीजा,लगातार बढ़ता तापमान, भीषण लू और जनजीवन पर सीधा असर.
भारतीय मौसम विभाग ने पहले ही चेताया है कि आने वाले दिनों में उत्तर-पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत में लू का प्रकोप और बढ़ सकता है. इस बार खतरा इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि कई इलाकों में नमी वाली गर्मी भी साथ जुड़ रही है, जो शरीर के लिए और अधिक घातक साबित होती है. 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच झूलता तापमान केवल असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य आपातस्थिति का संकेत है. खासकर बच्चे और बुजुर्ग इसके सबसे आसान शिकार बनते हैं. लू का असर केवल बाहरी नहीं, बल्कि शरीर के भीतर भी गहरा होता है. जब बाहरी तापमान शरीर के आंतरिक संतुलन को बिगाड़ देता है, तो मस्तिष्क का ‘हाइपोथैलेमस’ तापमान नियंत्रित करने में विफल होने लगता है. इसके परिणामस्वरूप डी-हाइड्रेशन, अंगों की निष्क्रियता और यहां तक कि जानलेवा स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है. यह स्पष्ट करता है कि लू कोई सामान्य गर्मी नहीं, बल्कि एक गंभीर चिकित्सीय चुनौती है.
लेकिन इस संकट की जड़ें और गहरी हैं. ‘हॉट डोम’ जैसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का प्रत्यक्ष परिणाम हैं. बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें, अनियंत्रित औद्योगिकीकरण और प्रकृति के साथ असंतुलित विकास ने वायुमंडल की संरचना को बदल दिया है. वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो भविष्य में ऐसे ‘आकाशीय प्रलय’ और अधिक तीव्र होंगे. खेत बंजर होंगे, जल स्रोत सूखेंगे और जीव-जंतुओं का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा.
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें भी इस खतरे की पुष्टि करती हैं. दक्षिण एशिया को 2030 तक बाढ़ और जल संकट के रूप में भारी आर्थिक और सामाजिक नुकसान झेलना पड़ सकता है. महासागरों में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड ने उनकी अवशोषण क्षमता को कम कर दिया है, जिससे वे अब ‘कार्बन सिंक’ के बजाय ‘कार्बन स्रोत’ बनने की ओर बढ़ रहे हैं. यह स्थिति वैश्विक तापमान को और तेज़ी से बढ़ाने वाली है.
ऐसे में सवाल केवल मौसम का नहीं, बल्कि हमारी विकास नीति का है. क्या हम अब भी चेतेंगे या तब तक इंतजार करेंगे जब तक प्रकृति का संतुलन पूरी तरह बिगड़ न जाए ? ‘हॉट डोम’ एक अस्थायी घटना नहीं, बल्कि एक स्थायी चेतावनी है. समय की मांग है कि सरकारें सख्त पर्यावरणीय नीतियां लागू करें, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दें और आम नागरिक भी अपनी जीवनशैली में बदलाव लाएं.दरअसल,
प्रकृति के साथ संतुलन ही अस्तित्व की कुंजी है. अगर हमने अब भी नहीं समझा, तो यह तपता आसमान आने वाले समय में जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है.
