डेयरी क्षेत्र: सफलता और सवाल

मध्यप्रदेश में डेयरी क्षेत्र को लेकर जो ताजा आंकड़े सामने आए हैं, वे केवल प्रगति के संकेत नहीं हैं, बल्कि सहकारिता मॉडल की प्रभावशीलता का भी प्रमाण हैं. वर्ष 2025-26 में 1752 नई दुग्ध सहकारी समितियों का गठन और 701 निष्क्रिय समितियों का पुनर्जीवन, राज्य की डेयरी नीति के ठोस क्रियान्वयन को दर्शाता है. इन सक्रिय प्रयासों का परिणाम है कि प्रतिदिन 9 लाख 67 हजार किलोग्राम दुग्ध संकलन संभव हो पाया है. यह उपलब्धि न केवल प्रशासनिक सफलता है, बल्कि लाखों ग्रामीण परिवारों की आर्थिक धडक़नों से जुड़ी हुई है. डेयरी क्षेत्र भारत के ग्रामीण ढांचे की रीढ़ माना जाता है. मध्यप्रदेश जैसे राज्य, जहां कृषि पर निर्भर आबादी का बड़ा हिस्सा छोटे और सीमांत किसानों का है, वहां डेयरी गतिविधियां आय के स्थायी स्रोत के रूप में उभरती हैं. ऐसे में सहकारी समितियों का विस्तार और उन्हें सक्रिय बनाना केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का माध्यम है.नई समितियों का गठन यह दर्शाता है कि सरकार गांव-गांव तक डेयरी नेटवर्क को फैलाने के लिए गंभीर है. वहीं, निष्क्रिय समितियों को पुनर्जीवित करना यह संकेत देता है कि केवल विस्तार ही नहीं, बल्कि पहले से मौजूद संरचनाओं को सुदृढ़ करना भी प्राथमिकता में है. अक्सर देखा गया है कि योजनाएं शुरू तो होती हैं, लेकिन समय के साथ उनकी गति धीमी पड़ जाती है. ऐसे में 701 समितियों को फिर से सक्रिय करना एक सकारात्मक और व्यावहारिक पहल है.

दुग्ध संकलन के आंकड़े इस पूरी प्रक्रिया की सफलता को प्रमाणित करते हैं. प्रतिदिन लगभग 10 लाख किलोग्राम के करीब दूध का संग्रहण यह बताता है कि ग्रामीण स्तर पर उत्पादन और विपणन की श्रृंखला मजबूत हो रही है. इससे किसानों को नियमित आय मिलती है, जो कृषि के अनिश्चित स्वरूप के बीच आर्थिक स्थिरता प्रदान करती है.

हालांकि, इन उपलब्धियों के बीच कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी उठते हैं. क्या यह वृद्धि दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ है ? क्या समितियों के पास पर्याप्त तकनीकी और प्रबंधन क्षमता है ? क्या किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य लगातार मिल पा रहा है ? इन प्रश्नों के उत्तर ही इस मॉडल की वास्तविक सफलता तय करेंगे.

डेयरी क्षेत्र में केवल समितियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है. इसके लिए पशुपालन की गुणवत्ता, पशुओं के स्वास्थ्य, चारा प्रबंधन और आधुनिक तकनीकों का उपयोग भी उतना ही आवश्यक है. यदि इन पहलुओं पर समानांतर रूप से ध्यान नहीं दिया गया, तो यह वृद्धि सीमित हो सकती है.

महिला भागीदारी भी इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण आयाम है. डेयरी गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका परंपरागत रूप से मजबूत रही है, लेकिन उन्हें औपचारिक रूप से सहकारी ढांचे में शामिल करना अभी भी एक चुनौती है. यदि महिला सदस्यता को प्राथमिकता दी जाए, तो यह न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में भी बड़ा कदम होगा.

कुल मिलाकर मध्यप्रदेश का डेयरी मॉडल एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ता दिख रहा है. नई समितियों का गठन, निष्क्रिय इकाइयों का पुनर्जीवन और बढ़ता दुग्ध संकलन यह संकेत देता है कि यदि नीति, क्रियान्वयन और निगरानी में संतुलन बना रहा, तो यह क्षेत्र ग्रामीण समृद्धि का मजबूत आधार बन सकता है. अब आवश्यकता इस बात की है कि इस गति को बनाए रखते हुए गुणवत्ता और स्थायित्व पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाए, ताकि सहकारिता का यह मॉडल वास्तव में “समृद्ध गांव, सशक्त किसान” के लक्ष्य को साकार कर सके.

 

 

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