वाशिंगटन/नई दिल्ली | दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं चरमरा रही थीं, तब अमेरिका ने डॉलर को सोने (Gold) से जोड़कर एक स्थिर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की नींव रखी। आज वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा डॉलर में ही होता है, क्योंकि यह दुनिया की सबसे विश्वसनीय मुद्रा मानी जाती है। डॉलर का यह प्रभुत्व केवल अमेरिका की सैन्य या आर्थिक ताकत का नतीजा नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें वैश्विक बैंकिंग और निवेश के उस अटूट भरोसे में हैं, जिसे ‘सेफ हैवन’ (Safe Haven) कहा जाता है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा डॉलर में रखना ही सुरक्षित समझते हैं।
डॉलर की अजेय शक्ति का एक मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का व्यापार है। ‘पेट्रो-डॉलर’ व्यवस्था के तहत, दुनिया के किसी भी देश को तेल खरीदने के लिए डॉलर की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि अधिकांश तेल निर्यातक देश इसी मुद्रा में भुगतान स्वीकार करते हैं। इस व्यवस्था ने डॉलर की वैश्विक मांग को निरंतर बनाए रखा है और इसे किसी भी बड़े आर्थिक संकट में कमजोर होने से बचाया है। इसके अलावा, अमेरिकी केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ द्वारा ब्याज दरों में किया गया मामूली बदलाव भी दुनिया भर के बाजारों और विकासशील देशों की मुद्राओं को सीधे प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर की असली ताकत वहां का पारदर्शी कानूनी तंत्र और दशकों से बनी स्थिरता है। हालांकि, हाल के वर्षों में कई देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने और डॉलर के विकल्प तलाशने की बात कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल इसके पास कोई मजबूत वैश्विक प्रतिस्पर्धी नहीं है। वैश्विक कर्ज और निवेश का विशाल हिस्सा आज भी डॉलर में ही मौजूद है, जिसे वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से हटाना नामुमकिन सा लगता है। जब तक दुनिया का वित्तीय ढांचा डॉलर पर आधारित है, तब तक यह ग्लोबल करेंसी के रूप में अपना सर्वोच्च स्थान बनाए रखेगा।

