
सीधी। जिले के मझौली जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत ठोंगा में 6 और 11 जनवरी को गिद्धों का एक बड़ा समूह देखा गया। विलुप्त के कगार पर पहुंच चुकी इस दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों को ग्रामीणों ने अपने कैमरों में कैद किया, जिससे वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों में चर्चा तेज हो गई है। गिद्ध कत्थई और काले रंग के भारी कद के पक्षी होते हैं, जिनकी दृष्टि अत्यंत तेज होती है। ये झुंड में रहने वाले मुर्दाखोर पक्षी हैं, जो मृत पशुओं और सड़े-गले मांस को खाकर प्रकृति की सफाई में अहम भूमिका निभाते हैं। इसी कारण इन्हें प्राकृतिक सफाईकर्मी भी कहा जाता है। इनकी आयु सामान्यतः 40 से 45 वर्ष तक होती है और ये चार से छह साल की उम्र में प्रजनन योग्य हो पाते हैं। गिद्धों की दृष्टि इंसानों से लगभग आठ गुना बेहतर मानी जाती है, ये खुले मैदान में चार मील दूर से भी शव देख सकते हैं।
गिद्धों की संख्या में लगातार गिरावट-
बीते दो दशकों में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इसका मुख्य कारण पशुचिकित्सा में उपयोग होने वाली डिक्लोफेनिक दवा रही है, जो मृत पशुओं के मांस के साथ गिद्धों के शरीर में पहुंचकर उनकी किडनी फेल कर देती थी। वर्ष 2008 में इस दवा पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके अलावा, हाई लेवल बिजली टॉवर और तारों से टकराने के कारण भी गिद्धों का पलायन और मौत हुई है।
इनका कहना है-
गिद्ध एक विलुप्तप्राय प्रजाति है। सीधी जिले में इनका दिखाई देना इस बात का संकेत है कि यहां इनके लिए अनुकूल वातावरण बन रहा है। खासतौर से संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र में पक्षियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे वन प्रबंधन उत्साहित है।
सुधीर मिश्रा , एसडीओ संजय टाइगर रिजर्व सीधी
