
इंदौर. पुलिस द्वारा एक जमानत मामले में गलत और भ्रामक हलफनामा पेश किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने एडिशनल डीसीपी दिशेष अग्रवाल और चंदन नगर टीआई इंद्रमणि पटेल को सीधे तौर पर पक्षकार बनाते हुए कहा कि मामला पुलिस की विश्वसनीयता से जुड़ा है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. सुनवाई अब 9 दिसंबर को होगी.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अनाज के अवैध भंडारण के मामले में आरोपी अनवर हुसैन की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इंदौर पुलिस के हलफनामे में गंभीर त्रुटियां मिलने पर सख्त टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि 4 नवंबर को मांगे गए जवाब में पेश किया हलफनामा विश्वास को ठेस पहुंचाने वाला है और इससे पुलिस के आचरण पर सीधा सवाल उठता है. पुलिस की ओर से दाखिल हलफनामे में आठ आपराधिक मामलों का हवाला दिया था, जिनमें से चार में अनवर हुसैन आरोपी ही नहीं है. एक केस में तो गलत तरीके से उसे रेप का आरोपी बताया गया. जब पीठ ने इस पर स्पष्टीकरण मांगा तो दलील दी गई कि यह गलती कंप्यूटर में नाम समान होने के कारण हुई. अदालत ने इस तर्क को गैर गंभीर माना और इसे पुलिस की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करने वाला बताया. कोर्ट ने माना कि हलफनामा एडीसीपी दिशेष अग्रवाल और टीआई इंद्रमणि पटेल की ओर से दाखिल हुआ है, इसलिए दोनों को औपचारिक रूप से पार्टी प्रतिवादी बनाया जाए. इसके साथ ही कहा गया कि अगर अधिकारियों को संबंधित जानकारी बाद में मिली है, तो यह पूरा मामला पुलिस की आंतरिक प्रक्रिया पर प्रश्न खड़ा करता है. इसी आधार पर पुलिस आयुक्त इंदौर को भी उनके पद की जिम्मेदारी के चलते पक्षकार बनाए जाने के निर्देश दिए गए. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही दोनों अधिकारियों को 25 नवंबर को व्यक्तिगत उपस्थिति का आदेश दिया था. पूरे प्रकरण को गंभीर मानते हुए अब आगे की सुनवाई 9 दिसंबर को तय की गई है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस की लापरवाही या गलत सूचना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सकती, इसलिए संबंधित अधिकारी जवाबदेह होंगे. यह मामला अब इंदौर पुलिस की कार्यशैली और रिकॉर्ड प्रबंधन पर बड़े सवाल खड़ा कर रहा है, जिसका जवाब अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट में देना होगा.
