यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में गतौरा और बिलासपुर स्टेशन के बीच हुई मेमू पैसेंजर ट्रेन और मालगाड़ी की टक्कर एक बार फिर भारतीय रेलवे प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करती है. इस भीषण दुर्घटना में 11 यात्रियों की मौत और कई लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है. जब दुनिया तीव्र गति से हाई-स्पीड ट्रेनों की दिशा में अग्रसर है, भारत में भी ‘वंदे भारत’ और बुलेट ट्रेन की चर्चाएं जोरों पर हैं. किंतु, इन आकांक्षाओं के बीच यदि यात्रियों की सुरक्षा की नींव कमजोर पड़ जाए, तो यह प्रगति नहीं, विफलता का संकेत है. यह समय रेलवे के लिए नारे या घोषणाओं से आगे बढक़र ठोस और प्रणाली गत सुधारों की ओर बढऩे का है. एक सिग्नल जंप, एक मामूली तकनीकी त्रुटि, और दर्जनों जिंदगियां खत्म ! यह अस्वीकार्य है. रेलवे की पहली और अंतिम जिम्मेदारी यात्रियों की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करना है. जब कोई व्यक्ति टिकट खरीदता है, वह केवल यात्रा का मूल्य नहीं, बल्कि अपने जीवन की सुरक्षा का विश्वास भी रेलवे को सौंपता है. इस भरोसे को बार-बार तोड़ा नहीं जा सकता. बिलासपुर की तरह की घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि रेलवे प्रशासन का झुकाव आधुनिकता की ओर तो है, परंतु वह सुरक्षा प्रणाली के समानांतर गति से विकसित नहीं हो रही. सरकार ‘कवच’ जैसी उन्नत टक्कर-रोधी प्रणाली की बात करती है, किंतु इसका क्रियान्वयन बेहद धीमी गति से हो रहा है. देश के सभी मुख्य और अधिक भीड़ वाले मार्गों पर ‘कवच’ का अनिवार्य और त्वरित कार्यान्वयन अत्यावश्यक है. यह प्रणाली चालक की संभावित त्रुटि के बावजूद ट्रेन को रेड सिग्नल पार करने से रोक सकती है और दो ट्रेनों की सीधी टक्कर को टाल सकती है. इसके साथ ही, मानव कारकों की अनदेखी घातक साबित हो रही है. लोको पायलटों का कार्य अत्यधिक तनावपूर्ण होता है, जिसके लिए नियमित प्रशिक्षण, मानसिक स्वास्थ्य परीक्षण और विश्राम के पर्याप्त प्रावधान अनिवार्य हैं. हर लोको इंजन में सतर्कता नियंत्रण उपकरण (वीसीडी) की समुचित कार्यक्षमता सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि समय रहते किसी असावधानी का पता लगाया जा सके. रेलवे की सिग्नलिंग व्यवस्था में भी त्वरित आधुनिकीकरण की आवश्यकता है. आज भी कई रूटों पर पुराने यांत्रिक या अर्ध-स्वचालित सिग्नल सिस्टम चल रहे हैं. इन्हें पूरी तरह डिजिटल, केंद्रीकृत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)-आधारित प्रणाली से बदलना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है. उपकरणों की नियमित निगरानी और रखरखाव प्रणाली को कठोर रूप से लागू करना होगा. इन सभी तकनीकी पहलुओं के साथ, शायद सबसे जरूरी है ‘सुरक्षा संस्कृति’ का निर्माण. रेलवे तंत्र में यह भावना दृढ़ता से स्थापित हो कि सुरक्षा लाभ से अधिक महत्वपूर्ण है. किसी परियोजना की गति या उद्घाटन की तिथि से अधिक मायने रखता है यात्रियों का जीवन. अधिकारियों और कर्मचारियों में यह संदेश स्पष्ट रूप से पहुंचना चाहिए कि सुरक्षा नियमों की अनदेखी को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा. भारत विश्व की सबसे बड़ी रेल सेवाओं में से एक संचालित करता है. यह केवल परिवहन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की धडक़न है. ऐसे में, सुरक्षा केवल रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नैतिक उत्तरदायित्व है. तेज गति की ट्रेनों का सपना तभी सार्थक है जब हर यात्री अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचे. बिलासपुर जैसी घटनाएं हमें यह याद दिलाती हैं कि प्रौद्योगिकी से पहले संवेदना और सतर्कता को प्राथमिकता देनी होगी. यही यात्रियों के प्रति सच्ची जिम्मेदारी और प्रगति का वास्तविक मापदंड है.

 

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