
उज्जैन । महाकाल लोक विस्तार के लिए मस्जिद ध्वस्त करने के मामले में उच्च न्यायालय ने मुस्लिम बस्ती के रहवासियों की याचिका पर फैसला दिया । जमीन अधिग्रहण को सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा है कि मस्जिद का निर्माण पुनःनहीं किया जा सकता और प्रशासन ही इस जमीन का मालिक है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने उज्जैन की तकिया मस्जिद को ध्वस्त किए जाने के बाद उसके पुनर्निर्माण की मांग करने वाली एक रिट अपील (WA-2782-2025) को खारिज कर दिया है।
जमीन अधिग्रहण वैध
दरअसल इंदौर हाई कोर्ट में जो याचिका प्रभावित पक्ष में लगाई थी उसे खारिज करते हुए कोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि उज्जैन जिला प्रशासन द्वारा भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वैध थी और नमाज़ अदा करने का धार्मिक अधिकार किसी विशेष स्थान से नहीं जुड़ा है।न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने 7 अक्टूबर 2025 को यह आदेश पारित किया।
यह था मामला
याचिकाकर्ता मोहम्मद तैय्यब एवं अन्य ने उज्जैन महाकाल मंदिर के पीछे स्थानीय निवासी होने का दावा करते हुए अपील दायर की थी। उनका कहना था कि उज्जैन के राजस्व वृत्त 3 के सर्वेक्षण क्रमांक 2324 से 2329 पर स्थित तकिया मस्जिद लगभग 200 साल पुरानी थी और 1985 की राजपत्र अधिसूचना द्वारा इसे वक्फ संपत्ति घोषित किया गया था।
11 जनवरी 2025 को तोड़ा था निर्माण
उक्त मस्जिद व आसपास की बस्ती को महाकाल लोक विस्तार करने के मद्देनजर एवम पार्किंग स्थल के विस्तार के तहत भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के बाद 11 जनवरी 2025 को ध्वस्त कर दिया गया था। इसी को प्रभावित परिवारों ने कोर्ट में चुनौती देकर याचिकाकर्ताओं ने मूल रूप से मस्जिद के पुनर्निर्माण और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने की मांग की थी।
पहली याचिका भी खारिज
इंदौर हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 04.09.2025 को भी एक याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि वक्फ बोर्ड ने स्वयं मुआवजे के अधिकार के लिए राज्य सरकार के खिलाफ एक दीवानी मुकदमा दायर किया है।
खंडपीठ ने राज्य सरकार के वकील, आनंद सोनी और याचिकाकर्ताओं के वकील, सैयद अशहर अली वारसी की दलीलें सुन फैसला दिया था।
मुआवजे का वितरण भी कर दिया न्यायालय ने स्वीकार किया कि मस्जिद और संबंधित भूमि का अधिग्रहण विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए किया गया था और मुआवजे का वितरण भी किया जा चुका है।
धार्मिक अधिकार पर कोर्ट की टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक पूर्व निर्णय (मोहम्मद अली खान बनाम विशेष भूमि अर्जन अधिकारी, 1978) का हवाला दिया। न्यायालय ने कहा कि नमाज़ पढ़ने का अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत) एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, जो किसी विशेष स्थान तक सीमित नहीं है।
न्यायालय ने कहा, “कोई व्यक्ति नमाज़ पढ़ने के लिए किसी विशेष मस्जिद में जा सकता है, यदि वह मौजूद है,वह किसी अन्य मस्जिद में जा सकता है यदि वह मस्जिद, जिसमें उसने पहले नमाज़ पढ़ी थी, अब मौजूद नहीं है, या वह अपने घर या अन्यत्र भी नमाज़ पढ़ सकता है।”
