फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो की हालिया भारत यात्रा ऐसे समय में संपन्न हुई है जब विश्व व्यवस्था अस्थिरता, युद्ध और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है. अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया की जटिलताओं के बीच भारत और फ्रांस ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि वे किसी गुट की परिधि में बंधकर नहीं, बल्कि ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के सिद्धांत पर आगे बढऩा चाहते हैं. यह दृष्टिकोण ही दोनों देशों की साझेदारी की असली ताकत है.
भारत और फ्रांस के संबंधों की विशेषता यह रही है कि वे तात्कालिक राजनीतिक लाभ पर आधारित नहीं हैं. 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद जब अनेक पश्चिमी देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगाए थे, तब फ्रांस ने अपेक्षाकृत संतुलित और समझदारीपूर्ण रुख अपनाया था. वही भरोसा आज एक परिपक्व रणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित हो चुका है. फ्रांस पहला पश्चिमी राष्ट्र था जिसके साथ भारत ने औपचारिक रणनीतिक साझेदारी स्थापित की. आज यह संबंध रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन तक विस्तृत हो चुका है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति मैक्रो के बीच विकसित व्यक्तिगत तालमेल ने इस संबंध को नई ऊर्जा दी है. दोनों नेताओं के बीच संवाद केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि साझा दृष्टि पर आधारित है. मैक्रो की इस यात्रा के दौरान रक्षा प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण, जेट इंजन निर्माण, उन्नत नौसैनिक सहयोग और हरित ऊर्जा परियोजनाओं पर हुई चर्चाएं बताती हैं कि पेरिस भारत को केवल एक विशाल बाजार नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देखता है. ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संदर्भ में फ्रांस की भूमिका विशेष महत्व रखती है. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में दोनों देशों की समान सोच इस साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण आयाम है. फ्रांस स्वयं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सामरिक उपस्थिति रखता है. वह इस क्षेत्र को स्वतंत्र, खुला और नियम-आधारित व्यवस्था के रूप में देखना चाहता है. भारत, जो स्वयं को ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ के रूप में स्थापित कर रहा है, फ्रांस के लिए एक स्वाभाविक सहयोगी है. चीन की आक्रामक समुद्री नीति और शक्ति संतुलन की राजनीति के बीच भारत-फ्रांस सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता का संतुलित विकल्प प्रस्तुत करता है.
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में हो रही प्रगति विशेष रूप से उल्लेखनीय है. केवल तैयार हथियारों की खरीद के बजाय संयुक्त उत्पादन और तकनीकी साझेदारी पर बल दिया जा रहा है. यह बदलाव भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को दर्शाता है. इसके साथ ही अंतरिक्ष सहयोग, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की प्रगति और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में साझेदारी भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की जा रही है. शिक्षा और जन-से-जन संपर्क भी इस संबंध को स्थायित्व प्रदान करते हैं. फ्रांस द्वारा भारतीय छात्रों के लिए अवसर बढ़ाने की पहल इस बात का संकेत है कि यह साझेदारी केवल सरकारों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समाजों के बीच भी मजबूत होगी. ज्ञान, नवाचार और स्टार्टअप सहयोग आने वाले दशक में संबंधों की नई आधारशिला बन सकते हैं.
समग्र रूप से देखें तो मैक्रो की यह यात्रा एक प्रतीकात्मक कूटनीतिक कार्यक्रम भर नहीं थी. यह एक स्पष्ट संदेश था कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में भारत और फ्रांस की भूमिका निर्णायक हो सकती है. रणनीतिक स्वायत्तता की साझा समझ, पारस्परिक सम्मान और दीर्घकालिक दृष्टि इस साझेदारी को विशेष बनाती है. बदलती वैश्विक राजनीति में नई दिल्ली और पेरिस की यह धुरी स्थिरता और संतुलन का नया अध्याय लिख रही है. कुल मिलाकर भारत – फ्रांस संबंध इस समय नए क्षितिज पर हैं.
