22 साल की उम्र में बने 70 साल के बुजुर्ग, एक नाटक ने बदल दी अन्नू कपूर की किस्मत

अन्नू कपूर ने रंगमंच से सफर शुरू कर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अभिनय निखारा। श्याम बेनेगल की ‘मंडी’ से फिल्मों में कदम रखा और ‘विक्की डोनर’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।

हिंदी सिनेमा में कई ऐसे कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और बहुमुखी प्रतिभा के दम पर अलग पहचान बनाई। अन्नू कपूर उन्हीं कलाकारों में से एक हैं। अपनी दमदार आवाज़, बेहतरीन संवाद अदायगी और शानदार अभिनय से उन्होंने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई। दिलचस्प बात यह है कि महज 22 साल की उम्र में 70 साल के बुजुर्ग का किरदार निभाना ही उनके फिल्मी करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

20 फरवरी 1956 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में जन्मे अन्नू कपूर का असली नाम अनिल कपूर है। उनके पिता मदनलाल एक पारसी थिएटर कंपनी चलाते थे, जबकि उनकी मां उर्दू की शिक्षिका थीं। घर में कला और साहित्य का माहौल जरूर था, लेकिन आर्थिक हालात मजबूत नहीं थे। परिवार ने संघर्ष के कई दौर देखे, यहां तक कि पढ़ाई के दौरान ही उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा।

अन्नू कपूर का करियर

युवावस्था में उन्होंने रंगमंच का रुख किया और बाद में एनएसडी में दाखिला लिया। यहीं से उनके अभिनय को नई दिशा मिली। एनएसडी के दौरान उन्होंने एक नाटक में 70 वर्षीय बुजुर्ग का किरदार निभाया। इतनी कम उम्र में उस किरदार की गहराई और परिपक्वता को जिस तरह उन्होंने मंच पर उतारा, उसने दर्शकों और समीक्षकों को हैरान कर दिया।

अन्नू कपूर की फिल्में

अन्नू कपूर के इसी अभिनय ने मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल का ध्यान खींचा। बेनेगल ने उन्हें अपनी फिल्म मंडी के लिए साइन किया। यही फिल्म अन्नू कपूर के सिनेमा सफर की बड़ी शुरुआत बनी। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1984 में आई उत्सव से उन्हें खास पहचान मिली। आगे चलकर उन्होंने ‘मिस्टर इंडिया’, ‘तेजाब’ और ‘राम लखन’ जैसी फिल्मों में भी प्रभावशाली भूमिकाएं निभाईं। हालांकि वे अक्सर सहायक किरदारों में नजर आए, लेकिन हर भूमिका को अपनी अनोखी शैली से यादगार बना दिया।

विक्की डोनर के लिए मिला ये बड़ा सम्मान

साल 2012 में रिलीज हुई विक्की डोनर उनके करियर का अहम पड़ाव साबित हुई। डॉक्टर बलदेव चड्ढा के किरदार के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित कई सम्मान मिले। फिल्मों के अलावा टीवी शो ‘अंताक्षरी’ की होस्टिंग और रेडियो कार्यक्रमों के जरिए भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। चार दशक से अधिक लंबे करियर में अन्नू कपूर ने साबित किया कि सच्ची प्रतिभा उम्र और परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती।

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